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जब हम ‘अंगूर’ का नाम सुनते हैं, तो हमारे दिमाग में सबसे पहले नासिक या सांगली का नाम आता है। लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि हमारे हिंगोली, परभणी और नांदेड़ की काली मिट्टी में अंगूर की मिठास क्यों नहीं घुल सकती?
आज खेती सिर्फ पसीना बहाने का काम नहीं, बल्कि दिमाग से ‘बिजनेस’ करने का जरिया है।अंगूर एक ऐसी फसल है जिसे अगर सही तकनीक और बाजार समझ के साथ किया जाए, तो यह एक एकड़ में कई लाख रुपये तक का मुनाफा देने की क्षमता रखती है। आज की इस ग्राउंड रिपोर्ट में, मैं (सचिन) आपको अंगूर की खेती का वो गणित समझाऊंगा जो आपको एक साधारण किसान से एक ‘सफल बिजनेसमैन’ बना देगा।
अंगूर एक ऐसी फसल है जिसे अगर सही तकनीक और बाजार समझ के साथ किया जाए, तो यह एक एकड़ में कई लाख रुपये तक का मुनाफा देने की क्षमता रखती है
1. अंगूर की खेती: जोखिम या जैकपॉट? (Introduction)
अंगूर की खेती को अक्सर ‘महंगी खेती’ कहा जाता है। हाँ, इसमें शुरुआत में निवेश (Investment) ज्यादा है, लेकिन इसका ‘रिटर्न’ भी उतना ही तगड़ा है। अगर आप कपास या सोयाबीन के पारंपरिक चक्र से बाहर निकलकर कुछ बड़ा करना चाहते हैं, तो अंगूर आपके लिए सबसे बेस्ट विकल्प है।
2026 के इस दौर में, जब पूरी दुनिया ‘हेल्थ कॉन्शियस’ हो गई है, रेसिड्यू फ्री (Residue Free) अंगूरों की मांग यूरोप और खाड़ी देशों में बहुत बढ़ गई है।
2. सही मिट्टी और जलवायु का चुनाव
अंगूर के लिए अच्छी जल निकासी वाली रेतीली दोमट या मध्यम काली मिट्टी सबसे अच्छी होती है।
- मिट्टी का pH: 6.5 से 7.5 के बीच होना चाहिए।
- जलवायु: अंगूर को फल पकने के समय शुष्क और गर्म मौसम चाहिए। हमारे मराठवाड़ा की गर्मी अंगूर की मिठास बढ़ाने में बहुत मदद करती है।
3. अंगूर की उन्नत किस्में (Varieties)
अगर आप निर्यात (Export) करना चाहते हैं, तो किस्म का चुनाव सोच-समझकर करें:
- थॉमसन सीडलेस (Thompson Seedless): यह एक्सपोर्ट के लिए नंबर-1 किस्म है।
- सुपर सोनाका: लंबे और मीठे अंगूर, जो भारतीय बाजार में बहुत पसंद किए जाते हैं।
- शरद सीडलेस: काले अंगूर, जिनमें रोगों से लड़ने की क्षमता अच्छी होती है।
- अनुष्का: यह नई किस्म है जो कम पानी में भी अच्छा उत्पादन देती है।

4. अंगूर के बाग की तैयारी और रोपण (Plantation)
अंगूर के पौधे लगाने का सही समय जनवरी-फरवरी या जून-जुलाई होता है।
- दूरी: दो कतारों के बीच 8 से 10 फीट और दो पौधों के बीच 4 से 6 फीट की दूरी रखें।
- ट्रेलिस सिस्टम (Trellis System): अंगूर की बेलों को सहारा देने के लिए ‘Y’ आकार के एंगल या मंडप सिस्टम का इस्तेमाल करें। इससे फल जमीन से ऊपर रहते हैं और बीमारियां कम लगती हैं।

5. अंगूर की खेती का ‘अर्थशास्त्र’ (Cost and Profit Table)
यहाँ एक एकड़ का मोटा-मोटी गणित दिया गया है ताकि आप अपनी तैयारी कर सकें:
| खर्च का विवरण | अनुमानित लागत (1 एकड़) |
| पौधे और रोपण | ₹40,000 – ₹50,000 |
| पिलर और तार (Trellis) | ₹1,50,000 – ₹2,00,000 |
| ड्रिप इरिगेशन | ₹40,000 (सब्सिडी के बाद कम) |
| खाद और दवाइयां (सालाना) | ₹80,000 – ₹1,00,000 |
| कुल शुरुआती निवेश | ₹3,50,000 – ₹4,50,000 |
| सालाना कमाई (3 साल बाद) | ₹8,00,000 – ₹12,00,000 |
6. सचिन भाई की ’10 अनमोल सलाह’ (Expert Tips)
अंगूर की खेती में मेरा अनुभव कहता है कि ये 10 बातें आपकी फसल बचा सकती हैं:
- छंटाई (Pruning) का समय: साल में दो बार छंटाई होती है—अप्रैल (Back Pruning) और अक्टूबर (Fruit Pruning)। अक्टूबर की छंटाई के बाद ही फल आते हैं, इसका समय कभी न चूकें।
- ड्रिप इरिगेशन ही अपनाएं: अंगूर को न ज्यादा पानी चाहिए, न कम। ड्रिप से पानी देने पर ‘क्रैकिंग’ (फलों का फटना) की समस्या नहीं होती।
- मल्चिंग पेपर का उपयोग: मिट्टी की नमी बनाए रखने और खरपतवार (घास) को रोकने के लिए मल्चिंग बहुत जरूरी है।
- कैनोपी मैनेजमेंट: बेल के पत्तों को इस तरह फैलाएं कि हर गुच्छे को सही धूप और हवा मिले।
- मधुमक्खियों का मित्र बनें: पोलिनेशन (परागण) के लिए बाग में मधुमक्खियों का होना बहुत जरूरी है। फ्लावरिंग के समय जहरीले कीटनाशकों से बचें।
- निर्यात के नियम: अगर एक्सपोर्ट करना है, तो ‘ग्रेप-नेट’ (GrapeNet) पर रजिस्ट्रेशन जरूर करवाएं।
- खाद का सही डोस: केवल यूरिया-डीएपी के भरोसे न रहें। सूक्ष्म पोषक तत्व (Boron, Calcium, Magnesium) अंगूर की चमक बढ़ाते हैं।
- छाछ और गुड़ का स्प्रे: जैविक तरीके से चमक बढ़ाने के लिए पुरानी छाछ और गुड़ के पानी का स्प्रे बहुत असरदार होता है।
- पक्षी नियंत्रण: फल पकने के समय पक्षियों से बचाने के लिए ‘नायलॉन नेट’ का इस्तेमाल करें।
- बाजार पर नजर: अपनी फसल को सीधे व्यापारियों को बेचने के बजाय, नासिक या सांगली की मंडियों के भाव ट्रैक करें।
7. प्रमुख रोग और उनका समाधान
अंगूर में दो सबसे बड़े दुश्मन हैं:
- डाउनी मिल्ड्यू (Downy Mildew): पत्तों के पीछे सफेद पाउडर जैसा दिखता है। इसके लिए ‘बोर्डो मिश्रण’ (Bordeaux Mixture) सबसे पुराना और बेस्ट इलाज है।
- पाउडरी मिल्ड्यू: यह फलों पर हमला करता है। इसके लिए सल्फर आधारित दवाइयों का इस्तेमाल करें।

8. हिंगोली-मराठवाड़ा के किसानों के लिए विशेष टिप
“मेरे भाइयों, हमारे इलाके में कैल्शियम की मात्रा मिट्टी में ज्यादा हो सकती है। इसलिए अंगूर लगाने से पहले मिट्टी परीक्षण (Soil Testing) जरूर करवाएं। अगर पानी में खारापन है, तो ‘वॉटर सॉफ्टनर’ का इस्तेमाल करें। मेहनत हमारी, मिट्टी हमारी—मिठास भी हमारी ही होगी!”
9. हिंगोली से नासिक तक का सफर: हमारा अनुभव
“भाइयों, अक्सर हमें लगता है कि नई तकनीक सिर्फ किताबों में होती है। लेकिन हमने खुद हिंगोली और नांदेड़ के कई प्रगतिशील किसानों को नासिक के सफल बागों का दौरा (Study Tour) करवाया है। वहां के किसानों से बातचीत करके हमारे इलाके के किसानों ने यह सीखा कि कैसे कम पानी में भी एक्सपोर्ट क्वालिटी का अंगूर उगाया जा सकता है। नासिक के किसानों की सबसे बड़ी ताकत उनका ‘नियोजन’ (Planning) है, और वही नियोजन हम अब अपने हिंगोली-मराठवाड़ा में ला रहे हैं।”
10. निर्यात (Export) के लिए ‘ग्रेप-नेट’ (GrapeNet) पंजीकरण
अगर आप चाहते हैं कि आपका अंगूर विदेशों में बिके, तो आपको GrapeNet पर रजिस्ट्रेशन करना अनिवार्य है। यह सरकार की एक ऑनलाइन ट्रेसिबिलिटी प्रणाली है। इसमें आपके खेत की मिट्टी, पानी और इस्तेमाल की गई दवाइयों का पूरा रिकॉर्ड रखा जाता है। इससे खरीदार को भरोसा मिलता है और किसान को अंतरराष्ट्रीय भाव।

11. अंगूर की ‘थिनिंग’ (Thinning) और गुच्छों का आकार
अंगूर की खेती में सिर्फ फल आना काफी नहीं है। गुच्छे में बहुत ज्यादा अंगूर होने से उनका आकार नहीं बढ़ता। इसलिए ‘थिनिंग’ की प्रक्रिया बहुत जरूरी है। सचिन भाई की टिप: “एक गुच्छे में सीमित दाने रखने से हर अंगूर को बराबर पोषण मिलता है, जिससे उसका साइज ‘जम्बो’ होता है और मार्केट में रेट बढ़ जाता है।”
12. जिब्रेलिक एसिड (GA) का सही इस्तेमाल
अंगूर का आकार और चमक बढ़ाने के लिए GA (Gibberellic Acid) का इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन सावधान! इसकी मात्रा थोड़ी भी ऊपर-नीचे हुई, तो फल का स्वाद और क्वालिटी खराब हो सकती है। हमेशा कृषि विशेषज्ञों की सलाह पर ही ‘डिपिंग’ (Dipping) करें।
13. पैकिंग और कोल्ड स्टोरेज (Cold Storage) का महत्व
अंगूर टूटने के बाद बहुत जल्दी खराब होने लगता है। अगर आप सीधे खेत से नहीं बेच पा रहे हैं, तो ‘प्री-कूलिंग’ और कोल्ड स्टोरेज का सहारा लें। इससे आप अपनी फसल को तब तक रोक सकते हैं जब तक बाजार में भाव ऊपर न चला जाए।

14. बेदाना (Raisin/Kishmish) बनाने का विकल्प
अगर कभी अंगूर का भाव बहुत गिर जाए, तो घबराएं नहीं। आप अपने अंगूरों से ‘बेदाना’ (किशमिश) बना सकते हैं। महाराष्ट्र में सांगली और नासिक के किसान इसी तकनीक से करोड़ों कमा रहे हैं। सूखे अंगूर यानी किशमिश को आप साल भर स्टोर कर सकते हैं और जब दाम बढ़ें तब बेच सकते हैं।
15. इंटरक्रॉपिंग (Intercropping): खाली जगह का फायदा
अंगूर के दो कतारों के बीच काफी जगह होती है। शुरुआत के 1-2 साल जब तक बेल पूरी नहीं फैलती, आप उसमें सब्जियां या छोटी फसलें ले सकते हैं। इससे आपका शुरुआती खर्चा निकल जाता है और जमीन का सही इस्तेमाल होता है।
16. नैनो फर्टिलाइजर का प्रयोग
2026 की आधुनिक खेती में अब नैनो यूरिया और नैनो डीएपी का बड़ा रोल है। अंगूर की बेलों को ड्रिप के माध्यम से नैनो खाद देने से खाद की बर्बादी कम होती है और पत्तों में हरापन बना रहता है। इससे प्रकाश संश्लेषण (Photosynthesis) की प्रक्रिया तेज़ होती है।
17. क्लाइमेट कंट्रोल और ‘सेंसर’ तकनीक
अब ऐसे सेंसर आ गए हैं जो आपके मोबाइल पर बता देंगे कि बाग में नमी कितनी है और क्या किसी बीमारी का हमला होने वाला है। हिंगोली के किसान भी अब इस ‘स्मार्ट फार्मिंग’ को अपना रहे हैं ताकि जोखिम कम हो सके।

“अंगूर में पानी का सही नियोजन बहुत जरूरी है। इसके लिए सरकार की इस योजना का लाभ लें: [ठिबक सिंचन योजना 2026: 80% सब्सिडी यहाँ देखें]“
18. सामूहिक विपणन (Group Marketing) का जादू
“मेरा अनुभव है कि अगर गांव के 10 किसान मिलकर अपना अंगूर एक साथ एक्सपोर्टर को बेचते हैं, तो ट्रांसपोर्ट का खर्चा कम हो जाता है और मोलभाव करने की ताकत बढ़ जाती है। अकेले लड़ने से बेहतर है, एक ‘किसान उत्पादक कंपनी’ (FPO) बनाकर काम करें।”
नीचे दिए गए वीडियो में देखें कि अक्टूबर की छंटाई (Fruit Pruning) कैसे की जाती है, ताकि आपकी फसल बंपर हो।
19. अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1. क्या पहले साल से ही कमाई शुरू हो जाती है? उत्तर: नहीं, पहले साल बेल बढ़ती है। दूसरे साल से हल्की फसल मिलती है, लेकिन असली कमाई तीसरे साल से शुरू होती है।
Q2. अंगूर की खेती के लिए सरकारी अनुदान मिलता है? उत्तर: जी हाँ! ‘महाडीबीटी’ के माध्यम से नए बाग लगाने, ड्रिप और ट्रेलिस सिस्टम के लिए 50% से 80% तक सब्सिडी मिलती है।
Q3. एक एकड़ में कितने पौधे लगते हैं? उत्तर: दूरी के हिसाब से एक एकड़ में लगभग 1800 से 2000 पौधे लगते हैं।
20. निष्कर्ष (Conclusion)
अंगूर की खेती कोई जादू नहीं है, यह शुद्ध विज्ञान और मेहनत का मेल है। अगर आप रोजाना अपने बाग को समय दे सकते हैं और नई तकनीक सीखने के लिए तैयार हैं, तो यकीन मानिए, सोयाबीन-कपास आपको जो 10 साल में देंगे, अंगूर वो आपको 2 साल में दे देगा।
खेती से जुड़ी ऐसी ही सटीक और ज़मीनी जानकारी के लिए Mahayoddha.in को रोज चेक करें और इस लेख को अपने प्रगतिशील किसान मित्रों के साथ शेयर करें!
20. अस्वीकरण (Disclaimer):
Mahayoddha.in पर दी गई जानकारी केवल किसानों के ज्ञानवर्धन और शैक्षिक उद्देश्यों (Educational Purposes) के लिए है। इस लेख में बताए गए आंकड़े, खर्च और मुनाफे का गणित बाजार की स्थिति, भौगोलिक स्थान और व्यक्तिगत प्रबंधन के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।
अंगूर की खेती एक उच्च-निवेश (High-Investment) वाली फसल है, जिसमें जोखिम भी शामिल है। इसलिए, किसी भी प्रकार का बड़ा निवेश करने, रसायनों (Pesticides) का छिड़काव करने या नई तकनीक अपनाने से पहले अपने नजदीकी सरकारी कृषि विभाग, कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) या अपने क्षेत्र के अनुभवी अंगूर उत्पादक विशेषज्ञों से व्यक्तिगत सलाह जरूर लें।
लेखक या वेबसाइट किसी भी प्रकार के वित्तीय नुकसान, फसल की विफलता या गलत प्रबंधन के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे। खेती में सफलता आपकी मेहनत, सही समय पर लिए गए निर्णय और प्रकृति की स्थिति पर निर्भर करती है।
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