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हमारे मराठवाड़ा और विदर्भ में ‘तूर’ को केवल एक फसल नहीं, बल्कि किसान की ‘फिक्स्ड डिपॉजिट’ माना जाता है। जब सोयाबीन धोखा दे जाए या कपास पर कीड़ों का हमला हो, तब यह तूर ही है जो किसान की इज्जत बचाती है। लेकिन क्या आप जानते हैं कि हमारे हिंगोली, नांदेड़, अकोला और वाशिम के किसान आज भी तूर से सिर्फ 4-5 क्विंटल की औसत उपज ले रहे हैं?
आज के इस विशेष लेख में, मैं (सचिन) आपको तूर की खेती का वो आधुनिक और वैज्ञानिक तरीका बताऊंगा, जिससे आप प्रति एकड़ 12 से 15 क्विंटल तक की पैदावार ले सकते हैं। इस लेख को अंत तक पढ़ें, क्योंकि आखिरी में मैंने तूर के 2026 के मंडी भाव का भी विश्लेषण किया है।
1. तूर की खेती: एक परिचय (मिट्टी का डॉक्टर और किसान का ATM)
तूर (अरहर) को वैज्ञानिक भाषा में Cajanus cajan कहा जाता है, लेकिन हमारे महाराष्ट्र के खेतों में इसे ‘जमीन का डॉक्टर’ माना जाता है। अगर हम इसके परिचय की गहराई में जाएं, तो इसके तीन सबसे बड़े वैज्ञानिक और आर्थिक कारण हैं जो इसे हर किसान के लिए अनिवार्य बनाते हैं:
अ) अद्भुत जड़ तंत्र (Deep Root System):
तूर की जड़ें ‘मूसला जड़’ (Tap Root) श्रेणी में आती हैं, जो जमीन के अंदर 6 से 10 फीट की गहराई तक जा सकती हैं।
- फायदा: जब ऊपर की मिट्टी सूख जाती है और सोयाबीन या मूंग जैसे पौधे दम तोड़ देते हैं, तब तूर की जड़ें जमीन की निचली परतों से नमी (Moisture) खींच लेती हैं। यही कारण है कि मराठवाड़ा और विदर्भ के सूखे इलाकों में, जहाँ सिंचाई की सुविधा कम है, तूर एक ‘सुरक्षित फसल’ (Insurance Crop) साबित होती है।
ब) प्राकृतिक खाद का कारखाना (Biological Nitrogen Fixation):
तूर एक ‘लेग्यूम’ (Legume) फसल है। इसकी जड़ों में छोटी-छोटी गांठें (Nodes) होती हैं जिनमें ‘राइजोबियम’ (Rhizobium) नाम के बैक्टीरिया रहते हैं।
- गहरी बात: ये बैक्टीरिया हवा में मौजूद नाइट्रोजन को सोखकर उसे ‘नाइट्रेट’ में बदल देते हैं, जिसे पौधे आसानी से खाद के रूप में इस्तेमाल कर लेते हैं।
- सचिन भाई की टिप: “तूर लगाने का मतलब है कि आप अपने खेत में मुफ्त का यूरिया डाल रहे हैं। तूर कटने के बाद उस खेत में अगली फसल (जैसे गेहूं या ज्वार) बहुत ही शानदार होती है क्योंकि तूर जमीन को उपजाऊ छोड़कर जाती है।”
स) मृदा सुधारक (Soil Conditioner):
तूर की जड़ें जमीन की सख्त परत (Hard Pan) को तोड़ देती हैं। जब इसकी जड़ें जमीन के अंदर सड़ती हैं, तो वे छोटे-छोटे सुराख छोड़ जाती हैं, जिससे जमीन में ‘रेन वॉटर हार्वेस्टिंग’ अपने आप हो जाती है। बारिश का पानी सीधे पाताल में जाता है और जमीन की जलधारण क्षमता बढ़ जाती है।
द) शून्य से शिखर तक का सफर:
तूर एक ऐसी फसल है जिसका हर हिस्सा काम आता है। इसकी दाल हमें प्रोटीन देती है, इसके हरे पत्ते पशुओं के लिए पौष्टिक चारा बनते हैं, और इसकी सूखी लकड़ियां (Tur-Stalks) ग्रामीण इलाकों में ईंधन और छप्पर बनाने के काम आती हैं। यह किसान के लिए एक ‘ATM मशीन’ की तरह है, जिसे वह अपनी जरूरत के हिसाब से इस्तेमाल कर सकता है।

2. उन्नत किस्मों का चुनाव (नंबर-1 सीक्रेट)
सचिन भाई की पहली सलाह—किस्म वही चुनें जो आपके इलाके की मिट्टी को पसंद आए।
- BDN-711: यह किस्म हिंगोली और नांदेड़ में बहुत लोकप्रिय है। यह कम दिनों (150-160 दिन) में आती है और कम पानी में भी अच्छा रिजल्ट देती है।
- फुले राजेश्वर (Phule Rajeshwari): अगर आपके खेत में ‘मर’ (Wilt) रोग की समस्या ज्यादा है, तो यह किस्म सबसे बेस्ट है।
- गोदावरी और BSMR-736: भारी जमीन के लिए ये किस्में 12-14 क्विंटल तक उपज दे सकती हैं।

3. बुवाई का सही समय और तरीका (Spacing)
अक्सर हम तूर की बुवाई बहुत घनी कर देते हैं। तूर को फैलने के लिए जगह चाहिए।
- सही समय: जून के आखिरी हफ्ते से जुलाई के पहले हफ्ते तक।
- फासला: अगर आप तूर की अकेली फसल (Sole Cropping) ले रहे हैं, तो दो कतारों के बीच 4 से 5 फीट और दो पौधों के बीच 1 से 1.5 फीट की दूरी रखें।
- सचिन भाई की टिप: “तूर को हवा और धूप जितनी ज्यादा मिलेगी, उतनी ही ज्यादा टहनियां निकलेंगी और फलियां लगेंगी।”
4. बीज उपचार (Seed Treatment): बीमारियों का पक्का इलाज
बुवाई से पहले बीज उपचार करना 50% बीमारियों को खत्म कर देता है।
- स्टेप 1: मर रोग से बचने के लिए ‘ट्राइकोडर्मा विरिडी’ (5 ग्राम प्रति किलो बीज) का इस्तेमाल करें।
- स्टेप 2: नाइट्रोजन फिक्सेशन के लिए ‘राइजोबियम’ कल्चर लगाएं।

5. ‘पिंचिंग’ तकनीक (शेंडा खुडणे): पैदावार बढ़ाने का जादू
यह इस लेख का सबसे ‘Deep’ पॉइंट है। बहुत कम किसान इसे अपनाते हैं।
- पहली कटाई: बुवाई के 45 दिन बाद, जब पौधा घुटने तक आ जाए, तो उसके ऊपर का 2-3 इंच का सिरा काट दें।
- दूसरी कटाई: बुवाई के 75-80 दिन बाद फिर से सिरा काटें।
- फायदा: इससे पौधा ऊपर बढ़ने के बजाय चारों तरफ फैलता है। एक पेड़ पर 50 की जगह 200 टहनियां आती हैं।

6. खाद और पानी का प्रबंधन
तूर को बहुत ज्यादा यूरिया की जरूरत नहीं होती, क्योंकि यह खुद नाइट्रोजन बनाती है।
- जरूरी खाद: बुवाई के समय सल्फर (Sulphur) जरूर डालें। दालों के दानों में चमक और वजन सल्फर से ही आता है।
- पानी: वैसे तो तूर बारिश पर निर्भर है, लेकिन फूल आने के समय (Flowering) और फलियां बनने के समय (Pod filling) अगर पानी की कमी हो, तो एक हल्की सिंचाई जरूर करें।
7. इल्ली और कीट नियंत्रण (Crop Protection)
तूर का सबसे बड़ा दुश्मन है—’शेंगा पोखरणारी अळी’ (Pod Borer)।
- उपाय: फूल आने की शुरुआत में नीम के तेल का छिड़काव करें।
- फेरोमोन ट्रैप: एक एकड़ में 5-8 कामगंध सापळे (Pheromone Traps) लगाएं। इससे नर पतंगे पकड़े जाते हैं और इल्लियों का जन्म रुक जाता है।
- दवा: भारी हमले के समय ‘इमामेक्टिन बेंजोएट’ या ‘स्पिनोसैड’ का इस्तेमाल डॉक्टर की सलाह पर ही करें।
8. तूर इंटरक्रॉपिंग का गणित (सोयाबीन + तूर)
मराठवाड़ा में ‘सोयाबीन + तूर’ सबसे हिट जोड़ी है।
- मॉडल: 4 कतारें सोयाबीन की और 2 कतारें तूर की (4:2) या फिर 3:1 का अनुपात रखें। इससे सोयाबीन जल्दी कट जाता है और तूर को बाद में पूरा फैलने का मौका मिलता है।

9. तूर मंडी भाव विश्लेषण 2026 (Mandi Bhav Analysis)
अब बात करते हैं आपके काम की। 2026 में तूर के भाव क्यों बढ़ेंगे?
- कारण 1: अंतरराष्ट्रीय बाजार में दालों की कमी है।
- कारण 2: सरकार की MSP (न्यूनतम समर्थन मूल्य) में भारी बढ़ोतरी।
- भविष्यवाणी: हिंगोली और अकोला की मंडियों के रुझान बताते हैं कि इस साल तूर का भाव ₹10,500 से ₹12,000 के बीच रह सकता है। इसलिए किसान भाइयों, माल को एक साथ बाजार में न लाएं, टुकड़ों में बेचें।
10. किसानों के जमीनी अनुभव (परभणी, नांदेड़, अकोला, वाशिम)
वाशिम के किसान गजानन का अनुभव:
“मैंने इस साल ‘पिंचिंग’ तकनीक अपनाई। पहले मुझे 5 क्विंटल तूर मिलती थी, इस बार 11 क्विंटल निकली। बस थोड़ा सा ध्यान और सही समय पर शेंडा खुडणे का चमत्कार है यह।”
अकोला के शेख भाई की सलाह:
“तूर में सबसे बड़ी गलती है मर रोग को नजरअंदाज करना। मैंने बीज उपचार किया और ट्राइकोडर्मा का उपयोग किया, जिससे मेरा एक भी पेड़ नहीं सूखा।”

11. सचिन भाई की 5 विशेष सलाह (High Value Points)
- सल्फर का जादू: तूर में डीएपी (DAP) के साथ 10 किलो सल्फर प्रति एकड़ डालें, दानों का साइज देखकर आप खुद हैरान रह जाएंगे।
- धुंध से बचाव: सर्दियों में जब सुबह बहुत धुंध (Fog) होती है, तब फूल झड़ने का डर रहता है। उस समय हल्का धुआं या बोरॉन (Boron) का स्प्रे करें।
- देसी जुगाड़: खेत में पक्षियों के बैठने के लिए ‘पक्षी थांबे’ (T-shaped sticks) लगाएं। पक्षी बैठेंगे और आपकी इल्लियों को चुन-चुन कर खा जाएंगे।
- मिट्टी चढ़ाना: बुवाई के 30 दिन बाद पौधों की जड़ों पर मिट्टी चढ़ाएं, इससे जड़ें मजबूत होती हैं और मर रोग कम होता है।
- भाव का इंतजार: अगर आपके पास स्टोर करने की जगह है, तो तूर को मार्च-अप्रैल तक रोकें, उस समय भाव सबसे ऊंचे होते हैं।
13. ‘सीड बेड’ (Sowing Bed) और रिज-फरो (Ridge & Furrow) तकनीक
तूर के साथ सबसे बड़ी समस्या ‘जलभराव’ (Waterlogging) की है। अगर जड़ों में 24 घंटे पानी रुक जाए, तो पूरी फसल सूख सकती है।
- गहरी जानकारी: तूर को हमेशा ‘वरंबा-सरी’ (Ridge & Furrow) पद्धति से लगाएं। इसमें बीज को मेड़ (Ridge) पर लगाया जाता है और पानी नाली (Furrow) में रहता है।
- फायदा: इससे जड़ों को हमेशा हवा (Aeration) मिलती रहती है। भारी बारिश में भी पानी नाली से बाहर निकल जाता है और जड़ें सड़ने से बच जाती हैं। परभणी यूनिवर्सिटी के प्रयोगों में देखा गया है कि इस पद्धति से पैदावार 20% तक बढ़ जाती है।

14. सूक्ष्म पोषक तत्वों (Micronutrients) का सटीक गणित
सिर्फ यूरिया और डीएपी देने से 15 क्विंटल का लक्ष्य पूरा नहीं होगा।
- जिंक और बोरोन का रोल: तूर में फूल आने की अवस्था में ‘बोरोन’ (1 ग्राम प्रति लीटर) का छिड़काव करने से परागण (Pollination) अच्छा होता है और फलियां खाली नहीं रहतीं (दाने पूरे भरते हैं)।
- सल्फर का महत्व: चूंकि तूर एक तिलहन जैसी दलहन भी है, इसलिए प्रति एकड़ 10 किलो बेंटोनाइट सल्फर देने से दाल में प्रोटीन और तेल की मात्रा बढ़ती है, जिससे दानों का वजन भारी होता है।
15. ‘मर रोग’ (Fusarium Wilt) का जैविक और रासायनिक समाधान
मर रोग (पेड़ों का अचानक सूखना) तूर का कैंसर है। इसे गहराई से समझना जरूरी है।
- जैविक इलाज: बुवाई के समय 1 एकड़ में 2 किलो ट्राइकोडर्मा विरिडी को 100 किलो गोबर की खाद में मिलाकर जमीन में डालें। यह एक मित्र फफूंद है जो शत्रु फफूंद को खा जाती है।
- रासायनिक इलाज: अगर बीमारी खड़ी फसल में दिखे, तो ‘कार्बेंडाजिम + मैनकोजेब’ का घोल बनाकर संक्रमित पेड़ की जड़ों में ‘ड्रेंचिंग’ (Drenching) करें।

16. प्रकाश संवेदनशीलता (Photo-sensitivity) और बुवाई का समय
तूर एक ऐसी फसल है जो दिन की लंबाई (Daylight) के हिसाब से फूल देती है।
- तकनीकी बात: अगर आप बुवाई में बहुत देरी करते हैं, तो पेड़ को बढ़ने का समय नहीं मिलता और वह छोटा रहकर ही फूल देने लगता है।
- सचिन भाई की सलाह: “हिंगोली और वाशिम के किसान भाइयों, अगर आप जून के आखिरी हफ्ते तक बुवाई कर लेते हैं, तो पेड़ को ‘वानस्पतिक वृद्धि’ (Vegetative Growth) के लिए पूरा समय मिलता है, जिससे टहनियों की संख्या ज्यादा होती है।”
17. कीट नियंत्रण के लिए ‘ETL’ (Economic Threshold Level) को समझना
अक्सर किसान इल्ली दिखने से पहले ही भारी दवाइयों का स्प्रे कर देते हैं, जो पैसे की बर्बादी है।
- नियम: जब आपको एक पेड़ पर 1-2 इल्लियां या 5-10% फूलों का नुकसान दिखे, तभी छिड़काव करें।
- छिड़काव का सही समय: हमेशा शाम के समय स्प्रे करें, क्योंकि तूर की इल्लियां शाम को ज्यादा सक्रिय होती हैं। स्प्रे करते समय नोजल को पेड़ के अंदरूनी हिस्सों तक पहुँचाएं, क्योंकि इल्लियां टहनियों के बीच छिपी रहती हैं।
यह भी पढ़ें: अंगूर की खेती कैसे करें? जानें आधुनिक तकनीक और अधिक मुनाफे के तरीके।
मराठवाड़ा और विदर्भ के लिए विशेष ‘तूर कैलेंडर’ (2026)
| महीना | कार्य (Operation) |
| जून-जुलाई | बीज उपचार और बेड पर बुवाई। |
| अगस्त | पहली पिंचिंग (शेंडा खुडणे) और निराई-गुड़ाई। |
| सितंबर | दूसरी पिंचिंग और ‘ट्राइकोडर्मा’ का दूसरा डोज। |
| अक्टूबर-नवंबर | फूलों की सुरक्षा (नीम तेल स्प्रे) और बोरोन का छिड़काव। |
| दिसंबर-जनवरी | इल्ली नियंत्रण और अंतिम सिंचाई (यदि आवश्यक हो)। |
21. तूर का निर्यात (Export): भारत से विदेशों तक का सफर
भारत दुनिया में तूर का सबसे बड़ा उत्पादक और उपभोक्ता दोनों है, लेकिन 2026 में भारत अब ‘वैल्यू ऐडेड’ तूर (दाल और पाउडर) के निर्यात पर जोर दे रहा है।
- निर्यात की गुणवत्ता (Export Quality): विदेशों में, खासकर दुबई, कनाडा और सिंगापुर में ‘बोल्ड ग्रेन’ (बड़े दाने) वाली तूर की मांग है। अगर आपके दाने एक समान साइज के हैं और उन पर कोई कीड़ा नहीं लगा है, तो उन्हें प्रीमियम रेट मिलता है।
- प्रोसेसिंग का महत्व: साबुत तूर के बजाय अगर आप उसकी ‘अनपॉलिश्ड दाल’ (Unpolished Dal) बनाकर निर्यात करते हैं, तो मुनाफा 40% तक बढ़ जाता है। अनपॉलिश्ड दाल को विदेशों में ‘हेल्थ फूड’ माना जाता है।
- APEDA का रोल: तूर निर्यात करने के लिए आपको APEDA के साथ पंजीकरण करना होता है। 2026 की नई नीति के तहत, छोटे किसान समूह (FPO) भी अब सीधे विदेशों में अपनी दाल भेज सकते हैं।

22. स्थानीय मंडियों का विश्लेषण: हिंगोली, वाशिम और परभणी
हमारे इन तीन जिलों को ‘तूर का गढ़’ कहा जाता है। यहाँ की मंडियों की अपनी कुछ विशेषताएं हैं जिन्हें हर किसान को जानना चाहिए:
अ) हिंगोली मंडी (Hingoli Market):
हिंगोली की मंडी अपनी ‘शुद्धता’ के लिए जानी जाती है। यहाँ की तूर में नमी (Moisture) कम होती है, इसलिए बाहर के व्यापारी यहाँ से बड़ी मात्रा में माल उठाते हैं।
- सचिन भाई की टिप: “हिंगोली के किसान भाइयों, यहाँ नवंबर के अंत में आवक शुरू होती है, लेकिन सबसे अच्छे भाव जनवरी के दूसरे हफ्ते में मिलते हैं। हिंगोली मंडी में ‘ग्रेडिंग’ किए हुए माल को हमेशा ₹200-300 ज्यादा मिलते हैं।”
ब) वाशिम मंडी (Washim Market):
वाशिम और कारंजा लाड (Karanja Lad) मंडियां पूरे विदर्भ में तूर के भाव तय करती हैं। यहाँ बड़े-बड़े दाल मिल मालिक सीधे खरीदारी करते हैं।
- खास बात: वाशिम की मंडी में तूर की आवक बहुत ज्यादा होती है। यहाँ भाव की स्थिरता (Stability) अच्छी रहती है। अगर आपके पास बड़ी मात्रा में माल है, तो वाशिम मंडी आपके लिए सबसे सुरक्षित है।
स) परभणी मंडी (Parbhani Market):
परभणी में ‘वसंतराव नाईक कृषि विश्वविद्यालय’ (VNMKV) होने के कारण यहाँ के किसान बहुत जागरूक हैं। यहाँ की मंडियों में अक्सर ‘BDN-711’ और नई किस्मों की तूर सबसे ज्यादा आती है।
- व्यापारी नजरिया: परभणी की तूर की दाल की क्वालिटी ‘मलाईदार’ मानी जाती है, इसलिए हैदराबाद के व्यापारी यहाँ से माल खरीदने में ज्यादा दिलचस्पी दिखाते हैं।

23. किसानों के असली अनुभव: “जब तूर ने बदली किस्मत”
वाशिम के प्रगतिशील किसान महादेवराव का अनुभव:
“पहले मैं तूर को सीधे मंडी ले जाता था। पिछले साल सचिन भाई की सलाह पर मैंने माल की सफाई की और उसे ग्रेड के हिसाब से अलग किया। मुझे साधारण भाव से ₹450 प्रति क्विंटल ज्यादा मिले। अब मैं अपनी खुद की छोटी दाल मिल लगाने की सोच रहा हूँ।”
हिंगोली के युवा किसान गजानन की सफलता:
“मैंने इस बार ‘रिज-फरो’ (वरंबा-सरी) पद्धति से तूर लगाई। भारी बारिश में भी मेरी फसल नहीं डूबी, जबकि पड़ोसी की तूर पीली पड़ गई थी। मेरी पैदावार सीधे 6 क्विंटल से बढ़कर 11 क्विंटल हो गई।”
तूर की खेती की पूरी जानकारी के लिए यह वीडियो देखें: इस वीडियो में जानें कि कैसे उन्नत तकनीकों का उपयोग करके आप अपनी अरहर की फसल से रिकॉर्ड तोड़ पैदावार ले सकते हैं।
24. तूर की खेती में ‘इंटरनेशनल बिजनेस’ का अवसर
सचिन, आप अपने पाठकों को बताएं कि 2026 में अब किसान सिर्फ ‘खेती’ नहीं कर रहा, वह ‘एग्री-प्रेन्योर’ (Agripreneur) बन रहा है।
- मॉडल: हिंगोली, परभणी और वाशिम के 10-15 युवा मिलकर एक ‘ब्रांड’ बना सकते हैं। जैसे— “महायोद्धा शुद्ध तूर दाल”। इस दाल को अमेजन (Amazon) या फ्लिपकार्ट पर बेचकर आप मंडी से तीन गुना ज्यादा पैसा कमा सकते हैं।
सचिन भाई का फाइनल ‘महायोद्धा’ संदेश:
“भाइयों, हिंगोली से लंदन तक का सफर मुश्किल नहीं है। बस हमें अपनी तूर को केवल ‘बोरी’ में भरकर बेचना बंद करना होगा। उसकी सफाई करें, ग्रेडिंग करें और अगर हो सके तो दाल बनाकर बेचें। हमारा मराठवाड़ा और विदर्भ सोने की खान है, बस हमें सही औजार (तकनीक) की जरूरत है।”
12. निष्कर्ष: तूर की खेती से आर्थिक क्रांति (The Final Word)
किसान योद्धाओं! आज के इस विस्तृत लेख से एक बात तो साफ है—तूर की खेती अब केवल ‘गुजारा’ करने वाली फसल नहीं रही, बल्कि यह एक ‘हाई-प्रॉफिट’ एग्री-बिजनेस बन चुकी है। हमारे मराठवाड़ा (हिंगोली, नांदेड़, परभणी) और विदर्भ (वाशिम, अकोला) की मिट्टी में वो ताकत है कि हम दुनिया को दाल खिला सकते हैं।
सिर्फ पसीना बहाने से सफलता नहीं मिलती, पसीने के साथ ‘पिंचिंग’, ‘बीज उपचार’, और ‘सल्फर’ जैसी आधुनिक तकनीक का मेल होना जरूरी है। अगर आप इस लेख में बताई गई वैज्ञानिक पद्धतियों को अपनाते हैं, तो प्रति एकड़ 15 क्विंटल का लक्ष्य अब दूर नहीं है। जब आपका खेत लहलहाएगा और मंडी में आपकी तूर सबसे ऊंचे दाम पर बिकेगी, तभी मेरा (सचिन का) यह प्रयास सफल होगा।
याद रखिए, “परिवर्तन ही प्रगति की कुंजी है”। पुरानी लकीर छोड़ें, आधुनिक बनें और अपनी अगली पीढ़ी के लिए खेती को एक गौरवशाली व्यवसाय बनाएं।
महायोद्धा बनिए, समृद्ध बनिए!
महत्वपूर्ण अस्वीकरण (Disclaimer)
Mahayoddha.in पर दी गई यह जानकारी केवल किसानों की जागरूकता और शैक्षिक मार्गदर्शन (Educational Purpose) के लिए है। लेख को तैयार करते समय कृषि विश्वविद्यालयों की सिफारिशों और अनुभवी किसानों के फीडबैक का पूरा ध्यान रखा गया है, फिर भी पाठक कृपया निम्नलिखित बातों को गंभीरता से नोट करें:
- व्यावसायिक सलाह: खेती में परिणाम मिट्टी के प्रकार, पानी की गुणवत्ता, स्थानीय जलवायु और बीज की गुणवत्ता पर निर्भर करते हैं। इसलिए, किसी भी तकनीक (जैसे पिंचिंग) को बड़े पैमाने पर लागू करने से पहले अपने खेत के एक छोटे हिस्से पर उसका ट्रायल जरूर लें।
- दवा और खाद का प्रयोग: इस लेख में बताए गए कीटनाशक (Pesticides) और उर्वरक (Fertilizers) केवल सुझाव मात्र हैं। किसी भी केमिकल का छिड़काव करने से पहले अपने क्षेत्र के प्रमाणित पशु चिकित्सा अधिकारी, कृषि विस्तार अधिकारी (ADO) या लाइसेंस प्राप्त कृषि विशेषज्ञ से लिखित परामर्श अवश्य लें। गलत मात्रा या गलत समय पर किया गया स्प्रे आपकी फसल को नुकसान पहुँचा सकता है।
- बाजार और भाव: मंडी भाव और निर्यात के आंकड़े बाजार की परिस्थितियों के अनुसार हर दिन बदलते रहते हैं। भविष्यवाणियां केवल बाजार के रुझानों पर आधारित हैं। माल बेचने या स्टोर करने का अंतिम निर्णय स्वयं अपने जोखिम पर लें।
- जिम्मेदारी की सीमा: इस लेख में दी गई जानकारी का उपयोग करने से होने वाले किसी भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वित्तीय नुकसान, फसल की विफलता या अन्य किसी भी क्षति के लिए Mahayoddha.in या इसके लेखक सचिन उत्तरदायी नहीं होंगे।


