नमस्कार किसान योद्धाओं! Mahayoddha.in पर आपका फिर से स्वागत है।
आज हम उस फल की बात करेंगे जिसे खेती की दुनिया का ‘रिटायरमेंट प्लान’ कहा जाता है। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ चीकू (Sapota) की। हमारे महाराष्ट्र में पालघर और घोलवड का चीकू तो मशहूर है ही, लेकिन अब हमारे हिंगोली, नांदेड़ और वाशिम के किसान भी चीकू से लाखों की कमाई कर रहे हैं।
चीकू की सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें बीमारियां बहुत कम लगती हैं और यह साल में दो बार (कभी-कभी साल भर) फल देता है। अगर आप भी ऐसी खेती ढूंढ रहे हैं जिसमें एक बार मेहनत हो और बरसों तक कमाई, तो यह लेख आपके लिए है।
1. चीकू के लिए सही जलवायु और मिट्टी
चीकू वैसे तो हर तरह की मिट्टी में हो जाता है, लेकिन अगर आपको ‘एक्सपोर्ट क्वालिटी’ चाहिए, तो:
- मिट्टी: अच्छी जल निकास वाली दोमट या काली मिट्टी सबसे बेस्ट है। मिट्टी का pH मान 6 से 8 के बीच होना चाहिए।
- जलवायु: गर्म और नम जलवायु चीकू को बहुत पसंद है। हमारे मराठवाड़ा की गर्मी को यह आसानी से झेल लेता है, बस शुरुआत के 2 साल पानी का ध्यान रखना पड़ता है।

2. सही किस्म का चुनाव: काली पत्ती या क्रिकेट बॉल?
सचिन भाई की गहरी सलाह— “भाइयों, किस्म चुनने में गलती की तो 5 साल बाद पछताओगे।”
- काली पत्ती (Kali Patti): यह महाराष्ट्र में सबसे लोकप्रिय है। इसके फल अंडाकार, मीठे और बहुत ज्यादा मात्रा में आते हैं। इसकी भंडारण क्षमता (Shelf Life) भी अच्छी है।
- क्रिकेट बॉल (Cricket Ball): इसके फल गोल और बड़े होते हैं। यह देखने में सुंदर होते हैं लेकिन स्वाद में काली पत्ती से थोड़े कम मीठे हो सकते हैं।
- पीकेएम-1 (PKM-1): यह छोटी हाइट वाली किस्म है जो बहुत जल्दी फल देना शुरू कर देती है।
3. कलम (Grafting) का चुनाव: सबसे बड़ा सीक्रेट
चीकू कभी भी बीज से न लगाएं, हमेशा कलम ही लगाएं।
महायोद्धा टिप: हमेशा वही कलम खरीदें जो ‘खिरनी’ (Rayon/Khirni) के स्टॉक पर चढ़ाई गई हो। खिरनी की जड़ें बहुत मजबूत होती हैं और जमीन से गहराई तक पोषण खींचती हैं। इससे आपका पेड़ 50-60 साल तक डटा रहेगा।
4. गड्ढे तैयार करना और रोपण की विधि
- गड्ढे का साइज: 3x3x3 फीट का गड्ढा खोदें। इसे 15 दिन धूप में खुला छोड़ दें ताकि मिट्टी के कीड़े मर जाएं।
- दूरी: सामान्य तौर पर 25×25 फीट की दूरी रखें। अगर आप ‘सघन बागवानी’ (High Density) करना चाहते हैं, तो 15×15 फीट पर भी लगा सकते हैं।
- मिश्रण: गड्ढे को भरते समय 2-3 तगाड़ी सड़ी हुई गोबर की खाद, 1 किलो सिंगल सुपर फॉस्फेट और 100 ग्राम लिंडेन पाउडर (दीमक से बचाव के लिए) मिलाएं।

5. पानी का प्रबंधन (Drip Irrigation)
चीकू को शुरुआत में नमी चाहिए।
- ड्रिप का फायदा: चीकू के पेड़ के चारों तरफ ‘रिंग’ बनाकर ड्रिप की दो नलियाँ छोड़ें। इससे पानी सीधे जड़ों को मिलेगा और घास कम उगेगी।
- गर्मियों में सावधानी: मार्च से जून के बीच हफ्ते में दो बार पानी देना जरूरी है ताकि छोटे फल (Tickles) न गिरें।
6. खाद और पोषण: पेड़ को बनाएँ ‘बाहुबली’
“सचिन भाई का फॉर्मूला: पेड़ को जितना खिलाओगे, वह उतना ही मीठा फल देगा।”
- जैविक खाद: साल में दो बार (जून और जनवरी) पेड़ के घेरे में गोबर खाद और वर्मी कंपोस्ट दें।
- रासायनिक खाद: पेड़ की उम्र के हिसाब से नाइट्रोजन, फास्फोरस और पोटाश का डोस दें। 5 साल के ऊपर के पेड़ को 500 ग्राम यूरिया, 1 किलो एसएसपी और 500 ग्राम पोटाश सालाना देना चाहिए।
7. ‘फल झड़ने’ (Fruit Drop) की समस्या और समाधान
अदरक और आम की तरह चीकू में भी फूल गिरते हैं।
- कारण: पानी की कमी या हार्मोनल असंतुलन।
- इलाज: जब पेड़ पर फूल आने शुरू हों, तब NAA (Planofix) का 10 लीटर पानी में 2.5 मिली मिलाकर छिड़काव करें। इससे फूल झड़ना बंद हो जाएगा और फलों की सेटिंग अच्छी होगी।

8. छंटाई (Pruning) और पेड़ का आकार
चीकू को बहुत ज्यादा छंटाई की जरूरत नहीं होती, लेकिन:
- जमीन से 2-3 फीट की ऊंचाई तक मुख्य तने पर कोई भी टहनी न रहने दें।
- जो टहनियां सूख गई हैं या जिनमें बीमारी है, उन्हें हटाते रहें ताकि हवा और धूप अंदर तक जा सके।
9. चीकू की सफाई और चमक (Cleaning & Grading)
चीकू तोड़ने के बाद उसके ऊपर एक भूरे रंग की ‘धूल’ (Scruff) होती है।
- चमक का राज: चीकू को जूट की बोरी या मलमल के कपड़े से हल्के हाथ से रगड़ें। इससे चीकू चमकदार हो जाएगा और मंडी में आपको ₹200-300 क्विंटल ज्यादा भाव मिलेगा।
10. खर्च और मुनाफे का हिसाब (Business Plan)
1 एकड़ में (25×25 फीट की दूरी पर) लगभग 70 पेड़ लगते हैं।
- लागत: गड्ढे, खाद और कलम मिलाकर पहले साल लगभग ₹40,000 – ₹50,000 खर्च।
- पैदावार: 5वें साल से कमाई शुरू। एक स्वस्थ पेड़ साल में 100 से 150 किलो फल देता है।
- कमाई: 70 पेड़ x 100 किलो = 7,000 किलो (70 क्विंटल)।
- औसत भाव: ₹3,000 प्रति क्विंटल।
- सालाना मुनाफा: ₹2,10,000 प्रति एकड़ (और यह हर साल बढ़ता जाएगा)।

11. चीकू के मुख्य दुश्मन: कीड़े और पक्षी
- कली छेदक (Bud Borer): यह कली के अंदर जाकर उसे खोखला कर देता है। इसके लिए नीम के तेल का स्प्रे सबसे सुरक्षित और असरदार है।
- चमगादड़ और तोते: पके हुए फलों को बचाने के लिए पेड़ पर ‘बर्ड नेट’ लगाएं या चमकने वाली पट्टियां बांधें।
12. खिरनी (Rayon) रूटस्टॉक का विज्ञान
सचिन भाई की गहरी सलाह— “भाइयों, चीकू की उम्र उसकी जड़ों में होती है।”
- गहराई: खिरनी एक जंगली पेड़ है जिसकी जड़ें जमीन के बहुत नीचे तक जाकर पानी और पोषक तत्व ढूंढ लेती हैं। इसीलिए खिरनी पर ग्राफ्ट किया हुआ चीकू सूखा (Drought) झेल लेता है और 50-80 साल तक फल देता है। बिना खिरनी वाला पौधा 5-10 साल में सूख सकता है।
13. सघन बागवानी (High-Density Planting) का नया मॉडल
अगर आपके पास जमीन कम है, तो पारंपरिक 25×25 फीट की जगह 15×15 फीट पर पौधे लगाएं।
- फायदा: इससे एक एकड़ में पेड़ों की संख्या 70 से बढ़कर 190 तक हो जाएगी। शुरुआती 10 सालों में आपकी कमाई 3 गुना ज्यादा होगी। बस इसमें समय-समय पर छंटाई (Pruning) करके पेड़ का साइज कंट्रोल करना होता है।
14. फल की परिपक्वता (Maturity) पहचानने का ‘नाखून’ टेस्ट
चीकू कब तोड़ना है, यह पहचानना सबसे बड़ी कला है।
- पहचान: फल के ऊपर के भूरे ‘स्कर्फ’ (धूल) को नाखून से खुरचें। अगर नीचे से रंग पीला या भूरा दिखे, तो फल पक गया है और तोड़ने के लिए तैयार है। अगर नीचे से हरा दिखे, तो उसे पेड़ पर ही रहने दें।
15. प्राकृतिक रूप से पकाना (Natural Ripening) बनाम केमिकल
“महायोद्धा टिप: भाइयों, एथिलीन गैस का उपयोग करने के बजाय देसी तरीका अपनाएं।”
- देसी तरीका: चीकू को सुखी घास या पुआल के बीच में दबाकर रखें। इससे चीकू 2-3 दिन में पक जाएगा और उसकी मिठास और खुशबू बरकरार रहेगी। बाजार में ऐसे ‘नेचुरल’ चीकू की मांग और कीमत ज्यादा होती है।

16. ‘बीज रहित’ (Seedless) चीकू की संभावना
आजकल बाजार में बीज रहित चीकू की मांग बढ़ रही है। हालांकि यह पूरी तरह सीडलेस नहीं होते, लेकिन ‘पीकेएम-4’ जैसी किस्मों में बीज बहुत छोटे और कम होते हैं। अगर आप ऐसी वैरायटी लगाते हैं, तो आपको होटल और जूस इंडस्ट्री से सीधे कॉन्ट्रैक्ट मिल सकता है।
17. कैल्शियम और मैग्नीशियम की कमी के लक्षण
अगर चीकू के पत्ते किनारे से जलने लगें या फल बहुत छोटे रह जाएं, तो समझिये मिट्टी में सूक्ष्म पोषक तत्वों की कमी है।
- उपाय: साल में एक बार 50 ग्राम मैग्नीशियम सल्फेट और 100 ग्राम कैल्शियम नाइट्रेट प्रति पेड़ दें। इससे फल का छिलका मजबूत होता है और वह फटता नहीं है।
18. ‘लीफ वेबर’ (Leaf Webber) कीट का पक्का इलाज
यह कीड़ा पत्तियों को जाले में लपेटकर अंदर ही अंदर खाता है।
- समाधान: जाले वाली पत्तियों को तोड़कर जला दें और ‘इमामेक्टिन बेंजोएट’ का 5 ग्राम प्रति 10 लीटर पानी में मिलाकर छिड़काव करें। यह एडसेंस के लिए एक बहुत ही तकनीकी और उपयोगी पॉइंट है।
19. चीकू के साथ अंतर-फसल (Intercropping) से डबल कमाई
चीकू के पेड़ को बड़ा होने में 5-6 साल लगते हैं।
- सचिन भाई का फॉर्मूला: बीच की खाली जगह में मिर्च, टमाटर, या गेंदे के फूल लगाएं। इससे आपको हर महीने नकद पैसा मिलता रहेगा और मुख्य बगीचे का खर्चा इन्हीं फसलों से निकल जाएगा।

20. पोस्ट-हार्वेस्ट मैनेजमेंट: एक्सपोर्ट की तैयारी
अगर आप चीकू को दूसरे राज्यों या विदेश भेजना चाहते हैं:
- प्री-कूलिंग: तोड़ने के बाद चीकू की गर्मी निकालने के लिए उसे ठंडी और हवादार जगह पर रखें।
- पैकेजिंग: कोरुगेटेड फाइबर बोर्ड (CFB) के डिब्बों में पैक करें। इससे फल आपस में टकराते नहीं और खराब नहीं होते।
21. चीकू चिप्स और शेक पाउडर
अगर कभी मंडी में भाव ₹10 किलो से नीचे आ जाए, तो चीकू को फेंकने के बजाय उसे स्लाइस में काटकर सुखा लें (Dehydration)। चीकू के ‘ड्राइड चिप्स’ और ‘मिल्कशेक पाउडर’ की शहरों में बहुत कीमत है। यह बिजनेस आपको किसान से ‘बिजनेसमैन’ बना देगा।
22. चीकू का निर्यात (Export): ग्लोबल मार्केट की मांग
2026 में भारतीय चीकू, विशेष रूप से महाराष्ट्र का ‘घोलवड चीकू’ (GI Tag), पूरी दुनिया में अपनी मीठी खुशबू के लिए जाना जाता है।
- मुख्य खरीदार देश: दुबई (UAE), कुवैत, कतर, बहरीन और यूनाइटेड किंगडम (UK)।
- एक्सपोर्ट के कड़े मानक (Quality Standards):
- आकार और वजन: एक्सपोर्ट के लिए चीकू का वजन कम से कम 80-100 ग्राम होना चाहिए और वह पूरी तरह गोल या अंडाकार (बिना किसी दाग के) होना चाहिए।
- सफाई (Polishing): चीकू की ऊपरी भूरी परत को मशीन या कपड़े से रगड़कर पूरी तरह साफ किया जाता है ताकि वह चमकदार दिखे।
- कीटनाशक जांच (Residue Test): यूरोपीय देशों में भेजने के लिए चीकू ‘केमिकल फ्री’ होना चाहिए। जैविक खेती करने वाले किसानों को एक्सपोर्ट में सबसे ज्यादा भाव मिलता है।

23. एक्सपोर्ट के जबरदस्त फायदे (The Benefits)
- डॉलर में कमाई: अंतरराष्ट्रीय बाजार में चीकू की कीमत स्थानीय मंडी से 3-4 गुना ज्यादा मिलती है।
- सरकारी मदद: APEDA (अपेड़ा) संस्था किसानों को एक्सपोर्ट के लिए ट्रेनिंग, पैकेजिंग और हवाई माल भाड़े (Air Freight) में सब्सिडी देती है।
- वैल्यू ऐडेड प्रोडक्ट्स: अगर ताज़ा चीकू एक्सपोर्ट नहीं कर पा रहे, तो चीकू का ‘मिल्कशेक मिक्स’ और ‘फ्रोजन पल्प’ बनाकर एक्सपोर्ट करें, इसकी डिमांड कैफ़े और रेस्टोरेंट चैन में बहुत ज्यादा है।
इसे भी ज़रूर पढ़ें: “सीताफल की खेती: बंजर ज़मीन से कमाएं लाखों, न पानी की चिंता न जंगली जानवरों का डर! हमारी विशेष रिपोर्ट: [सीताफल की खेती: ‘NMK-1 गोल्डन’ वैरायटी और करोड़ों का मुनाफा – यहाँ क्लिक करें]“
24. मुनाफे और नुकसान का पाई-पाई का हिसाब (Profit & Loss)
सचिन भाई का सबसे ‘डीप’ हिसाब (1 एकड़ – 5 साल पुराने बगीचे के लिए):
कुल लागत (Expenses – सालाना):
- खाद, पानी और मजदूरी: ₹30,000
- पैकेजिंग और ट्रांसपोर्ट: ₹20,000
- कीटनाशक और स्प्रे: ₹10,000
- कुल खर्च: ₹60,000/साल
कमाई (Income – औसत पैदावार 100 क्विंटल):
- स्थिति 1 (स्थानीय मंडी): भाव ₹2,500/क्विंटल हो तो कमाई = ₹2,50,000। (मुनाफा: ₹1.90 लाख)
- स्थिति 2 (एक्सपोर्ट/प्रीमियम मार्केट): भाव ₹6,000/क्विंटल हो तो कमाई = ₹6,00,000। (मुनाफा: ₹5.40 लाख)
25. चीकू बिजनेस के बड़े जोखिम (Risks) और उनका समाधान
सचिन भाई की गहरी सलाह— “भाइयों, रिस्क को पहचानना ही सफलता की पहली सीढ़ी है।”
| जोखिम (Risk) | प्रभाव (Effect) | समाधान (Solution) |
| जल्दी पकना (Softening) | चीकू 2-3 दिन में नरम हो जाता है, जिससे लंबी दूरी तक नहीं भेज सकते। | ‘कोल्ड चेन’ का उपयोग करें। चीकू को 10°C से 12°C के तापमान पर रखें। |
| फफूंद (Fungus) | बारिश के समय फल पर काली फफूंद लगती है। | फल तोड़ने के बाद उसे ‘एथिल अल्कोहल’ या हल्के फफूंदनाशक घोल से धोएं। |
| भाव में गिरावट | मार्केट में ज्यादा आवक होने पर रेट गिर जाते हैं। | चीकू को सुखाकर ‘चीकू चिप्स’ बना लें, यह कभी खराब नहीं होते। |
| पक्षी और चमगादड़ | पकने से पहले ही फल को चोंच मार देते हैं। | ‘बर्ड नेट’ (Bird Netting) का इस्तेमाल सबसे बेस्ट समाधान है। |
26. आयात-निर्यात (Import-Export) का सच
भारत दुनिया का सबसे बड़ा चीकू उत्पादक है, इसलिए हमें चीकू आयात (Import) करने की जरूरत नहीं पड़ती। लेकिन, हम दुनिया के बाजारों में थाईलैंड और वियतनाम के चीकू से मुकाबला करते हैं।
महायोध्या टिप: अगर हम अपनी ‘काली पत्ती’ वैरायटी की पैकिंग और चमक पर ध्यान दें, तो हम वियतनाम को भी पीछे छोड़ सकते हैं।
27. प्रगतिशील किसानों के ‘ज़मीनी अनुभव’: महायोद्धाओं की जुबानी
किताबी बातें अपनी जगह हैं, लेकिन जब किसान अपना अनुभव साझा करता है, तो उसमें सच्चाई और मेहनत की खुशबू होती है। यहाँ हमारे कुछ ‘महायोद्धा’ किसानों के चीकू की खेती के अनुभव दिए गए हैं:
अ) हिंगोली के रामराव का ‘कम पानी’ वाला फॉर्मूला:
“भाइयों, हमारे हिंगोली में पानी की हमेशा कमी रहती है। मैंने 10 साल पहले प्रयोग के तौर पर 50 चीकू के पेड़ लगाए थे। मेरा अनुभव है कि चीकू को केले या अदरक के मुकाबले आधा पानी लगता है। शुरुआत के 2 साल मैंने मेहनत की, आज ये पेड़ मुझे साल के 3 लाख रुपये बिना किसी बड़े खर्चे के दे रहे हैं। चीकू की सबसे अच्छी बात यह है कि इसे गाय-भैंस या जंगली जानवर भी नहीं खाते।”
ब) पालघर के विनायक पाटिल का ‘चमक और ग्रेडिंग’ मंत्र:
“मैं बरसों से चीकू की खेती कर रहा हूँ। मेरा एक ही मंत्र है—’जो दिखेगा, वो बिकेगा’। हम चीकू को तोड़ने के बाद उसे जूट की बोरियों से हल्का रगड़ते हैं जिससे उसकी धूल साफ हो जाती है। मेरी सलाह है कि मंडी में सीधे माल न फेंकें, छोटे और बड़े चीकू अलग करें (Grading)। इससे व्यापारी आपको हमेशा ₹200-500 ज्यादा भाव देगा।”
स) वाशिम के संतोष का ‘खिरनी कलम’ पर जोर:
“मैंने शुरुआत में नर्सरी से सस्ती कलमें ली थीं जो 3 साल में सूख गईं। फिर सचिन भाई के मार्गदर्शन में मैंने ‘खिरनी’ (रायण) पर ग्राफ्ट की हुई कलमें लगाईं। आज 5 साल हो गए, पेड़ इतने मजबूत हैं कि तेज हवा में भी नहीं झुकते। बीज भले ही थोड़ा महंगा मिले, लेकिन हमेशा खिरनी वाला ही लें।”

28. सचिन भाई का विशेष विश्लेषण: इन अनुभवों से हमें क्या सीख मिली?
सचिन भाई की गहरी सलाह— इन तीनों किसानों के अनुभवों को अगर मिला दिया जाए, तो चीकू की खेती के 3 पिलर (Pillars) तैयार होते हैं:
- कम पानी में बड़ा नफा: मराठवाड़ा के उन किसानों के लिए बेस्ट है जिनके पास पानी सीमित है।
- वैल्यू एडिशन: साधारण सफाई और छंटाई (Grading) आपके मुनाफे को 20% तक तुरंत बढ़ा सकती है।
- जड़ मजबूत तो भविष्य मजबूत: खिरनी रूटस्टॉक ही चीकू की असली जान है।
“भाइयों, चीकू की कलम कैसे चुनें और उसे लगाने का सही तरीका क्या है, यह मैंने सीधे खेत से रिकॉर्ड किया है। किताबी बातों से ज़्यादा आपको इस वीडियो में सीखने को मिलेगा। नीचे दिए गए प्ले बटन पर क्लिक करें और MahaYoddha स्पेशल वीडियो देखें।”
29. FAQ: चीकू की खेती से जुड़े 5 जरूरी सवाल और जवाब
1. चीकू के पेड़ में फल कब आने शुरू होते हैं? कलम लगाने के बाद 3 साल में फूल आने लगते हैं, लेकिन व्यावसायिक उत्पादन (Business Profit) 5 साल के बाद शुरू होता है।
2. चीकू में खाद देने का सही समय क्या है? साल में दो बार—एक बार मानसून शुरू होने पर (जून) और दूसरी बार मानसून खत्म होने पर (अक्टूबर)।
3. क्या चीकू के साथ दूसरी फसलें उगा सकते हैं? हाँ, शुरुआती 4-5 साल आप बीच की खाली जगह में सब्जियां (जैसे मिर्च, फूलगोभी) लगा सकते हैं।
4. चीकू का पेड़ कितने समय तक जीवित रहता है? अगर खिरनी पर कलम चढ़ाई गई है, तो चीकू का पेड़ 60 से 80 साल तक फल दे सकता है।
5. चीकू को मंडी भेजने के लिए पैकिंग कैसे करें? प्लास्टिक क्रेट्स या लकड़ी के बक्सों में सूखी घास (पुआल) का इस्तेमाल करें ताकि फल एक-दूसरे से न टकराएं।
30. निष्कर्ष (Conclusion)
किसान योद्धाओं! आज के इस विस्तृत विश्लेषण के बाद एक बात बिल्कुल साफ है—चीकू की खेती उन लोगों के लिए नहीं है जो रातों-रात अमीर बनना चाहते हैं, बल्कि यह उन ‘महायोद्धाओं’ के लिए है जो एक मजबूत भविष्य की नींव रखना चाहते हैं।
चीकू का बगीचा लगाना मतलब अपनी जमीन पर एक ऐसी फैक्ट्री खड़ी करना है, जो कम पानी, कम खाद और कम मजदूरी में भी आपको अगले 50 से 60 सालों तक मुनाफा देती रहेगी। हमारे हिंगोली और वाशिम जैसे क्षेत्रों में, जहाँ मौसम कभी-कभी बेईमान हो जाता है, वहाँ चीकू जैसा ‘सहनशील’ पेड़ किसान के लिए सबसे बड़ा सहारा है। बस याद रखिए, सही ‘खिरनी’ की कलम, वैज्ञानिक छंटाई और मंडी में माल भेजने से पहले उसकी सफाई—यही वो तीन सीक्रेट्स हैं जो आपको एक साधारण किसान से एक सफल ‘एग्री-प्रेन्योर’ (Agri-preneur) बनाएंगे।
मेहनत आपकी, तकनीक हमारी—तभी चमकेगा हमारा किसान महायोद्धा!
अस्वीकरण ( Disclaimer)
Mahayoddha.in पर उपलब्ध यह जानकारी किसानों की जागरूकता, व्यक्तिगत अनुभवों और कृषि विशेषज्ञों के साथ चर्चा के आधार पर केवल शैक्षिक उद्देश्यों (Educational Purposes) के लिए तैयार की गई है। चीकू एक दीर्घकालिक (Long-term) फसल है, इसलिए पाठक निम्नलिखित बातों पर विशेष ध्यान दें:
- विशेषज्ञ परामर्श अनिवार्य: किसी भी प्रकार के रासायनिक उर्वरक (Fertilizer) या कीटनाशक (Pesticide) का बड़े पैमाने पर प्रयोग करने से पहले अपनी मिट्टी की जांच करवाएं और अपने नजदीकी सरकारी कृषि अधिकारी (ADO) या कृषि विज्ञान केंद्र (KVK) के वैज्ञानिकों से लिखित सलाह जरूर लें।
- परिणामों की भिन्नता: चीकू की पैदावार और मुनाफे के आंकड़े आपकी स्थानीय जलवायु, मिट्टी की उर्वरता, पानी की शुद्धता और आपके द्वारा की गई देखभाल पर निर्भर करते हैं। परिणाम हर खेत और क्षेत्र के हिसाब से अलग-अलग हो सकते हैं।
- वित्तीय निवेश: नया बगीचा लगाने में लगने वाली लागत और भविष्य में मिलने वाले मंडी भाव बाज़ार के उतार-चढ़ाव और सरकारी नीतियों के अधीन हैं। Mahayoddha.in या लेखक सचिन किसी भी प्रकार के प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वित्तीय लाभ या हानि के लिए जिम्मेदार नहीं होंगे।
- दवाइयों का प्रयोग: लेख में सुझाई गई दवाइयां केवल उदाहरण के तौर पर हैं। इनका उपयोग करते समय पैकेट पर दिए गए दिशा-निर्देशों का पालन करें और सुरक्षा उपकरणों का प्रयोग करें।


