नमस्कार किसान दोस्तों! क्या आपके पास पानी की कमी है? क्या आपकी जमीन पथरीली है और वहां अच्छी खेती नहीं होती? तो चिंता छोड़िये! भगवान ने एक ऐसा जानवर बनाया है जो सूखी घास खाकर आपको ‘कड़क नोट’ दे सकता है। उसका नाम है— भेड़ (Sheep/Mendhi)।
अक्सर लोग बकरी और भेड़ में कन्फ्यूज हो जाते हैं। लेकिन सच यह है कि भेड़ पालन (Sheep Farming) बकरी पालन से भी ज्यादा सुरक्षित है क्योंकि भेड़ को बीमारियां कम लगती हैं और यह झुंड में रहना पसंद करती है।
आज हम बात करेंगे ‘मैडगयाल’ नस्ल की, जिसे महाराष्ट्र का ‘शानदार और जानदार’ सोना कहा जाता है।
1. भेड़ पालन ही क्यों? (Why Sheep Farming?)
किसान भाई अक्सर पूछते हैं— “सचिन भाई, बकरी छोड़कर भेड़ क्यों पालें?” इसके 3 ठोस कारण हैं:
- कम खर्चा, जीरो मेंटेनेंस: बकरी को पेड़-पत्ते चाहिए, वो ऊपर मुंह करके खाती है। लेकिन भेड़ ‘ग्रेजर’ (Grazer) है, वो जमीन से सटकर सूखी घास, खरपतवार और फसल के अवशेष खा लेती है। इसे चराने का खर्चा ना के बराबर है।
- कठोर और सख्त (Hardy): भेड़ किसी भी मौसम में (चाहे 45 डिग्री गर्मी हो या कड़ाके की ठण्ड) एडजस्ट हो जाती है। इसमें बकरियों की तरह जल्दी निमोनिया या सर्दी-जुकाम नहीं होता।
- ट्रिपल कमाई (3 Way Income):
- मांस (Meat): मटन की डिमांड कभी कम नहीं होती।
- ऊन (Wool): साल में एक बार बाल काटकर बेचें।
- लेंडी खाद (Manure): यह सबसे बड़ा सीक्रेट है। भेड़ की खाद (Lendi Khat) में नाइट्रोजन सबसे ज्यादा होता है। अंगूर और अनार वाले किसान इसे मुंहमांगे दाम पर खरीदते हैं।
2. ‘मैडगयाल’ नस्ल: भेड़ों का बाहुबली (The Madgyal Breed)
अगर आप भेड़ पालन में मोटा पैसा कमाना चाहते हैं, तो साधारण ‘दक्कनी’ भेड़ के बजाय ‘मैडगयाल’ पालें। यह महाराष्ट्र के सांगली जिले (जत तहसील) की शान है।
- पहचान (Identification):
- इसका रंग सफेद होता है जिस पर भूरे (Brown) धब्बे होते हैं।
- सबसे बड़ी पहचान इसकी नाक है— एकदम तोते जैसी मुड़ी हुई (Parrot Nose)।
- यह कद-काठी में बहुत ऊंची और लंबी होती है। इसे देखते ही ‘रुबाब’ झलकता है।
- खासियत:
- साधारण भेड़ का बच्चा 3 महीने में 12-15 किलो का होता है, जबकि मैडगयाल का बच्चा 18-22 किलो तक चला जाता है।
- इसका मांस बहुत स्वादिष्ट माना जाता है।
- बाजार में मैडगयाल के नर (Breeding Ram) की कीमत ₹50,000 से लेकर ₹5 लाख तक भी हो सकती है (शौकीन लोगों के लिए)।

3. शेड और आवास: खर्चा कम, कमाई ज्यादा (Housing)
भेड़ को ‘महलों’ की जरुरत नहीं है।
- खुला बाड़ा: भेड़ को बंद कमरे में रहना पसंद नहीं है। उसे ताजी हवा चाहिए।
- बाड़ (Fencing): खेत के एक कोने में तार की जाली (Chain link fencing) लगा दें।
- छत: सिर्फ बारिश और धूप से बचाने के लिए एक साधारण टिन का शेड काफी है। नीचे की जमीन सूखी होनी चाहिए। गीली जमीन होने पर भेड़ के खुर (Hoofs) सड़ने लगते हैं (Foot Rot)।
4. खाना और चारा: क्या खिलाएं? (Feeding Management)
भेड़ पालन में 70% खर्चा चारे का है। इसे कम कैसे करें?
- चराई (Grazing): भेड़ को रोज 6-8 घंटे चराना सबसे अच्छा है। यह खेत की मेड़ पर उगी घास खाकर पेट भर लेती है।
- स्टॉल फीडिंग (बंदिस्त पालन): अगर आप इसे शेड में रखकर पाल रहे हैं, तो:
- सूखा चारा: सोयाबीन का भूसा, चने का कुटा, या मूंगफली का पाला।
- हरा चारा: मक्का, नेपियर घास या दशरथ घास।
- दाना: गाभिन भेड़ और बढ़ने वाले बच्चों को रोज 200-250 ग्राम मक्का/गेहूं का दलिया दें।
- पानी: भेड़ पानी कम पीती है, लेकिन साफ पानी हमेशा उपलब्ध रखें।

5. स्वास्थ्य और टीकाकरण (Health & Vaccination)
भेड़ को सिर्फ एक दुश्मन से बचाना है— ‘पेट के कीड़े’ (Worms)। चूंकि भेड़ जमीन से सटकर घास खाती है, इसलिए कीड़े उसके पेट में जल्दी जाते हैं।
- डिवॉर्मिंग (Deworming): हर 3 महीने में एक बार पेट के कीड़े मारने की दवा (जैसे Albendazole या Ivermectin) जरुर दें। बारिश शुरू होने से पहले और बाद में यह अनिवार्य है।
- ET वैक्सीन (Enterotoxaemia): भेड़ अगर ज्यादा हरा चारा खा ले, तो उसके पेट में जहर बन जाता है और वो अचानक मर जाती है। इसे ‘फड़किया रोग’ कहते हैं। साल में एक बार (मानसून से पहले) ET का टीका जरुर लगवाएं।
- PPR टीका: यह 3 साल में एक बार लगता है। यह प्लेग जैसी बीमारी से बचाता है।
6. ब्रीडिंग मैनेजमेंट: ‘इनब्रीडिंग’ से बचें (Breeding Strategy)
भेड़ पालन में सबसे बड़ी गलती किसान यह करता है कि वह एक ही नर (Ram) को सालों तक रखता है।
- समस्या: अगर पिता (Ram) और उसकी बेटी (Ewe) के बीच क्रॉसिंग हो गई, तो पैदा होने वाले बच्चे कमजोर होंगे, उनकी बढ़वार नहीं होगी और वे जल्दी मरेंगे। इसे ‘इनब्रीडिंग’ (Inbreeding) कहते हैं।
- समाधान:
- हर 2 साल में अपना नर (Breeder Ram) बदल दें। उसे दूसरे किसान के नर से एक्सचेंज कर लें।
- अनुपात: 25 से 30 मादा भेड़ों के लिए 1 तगड़ा नर (मैडगयाल या अच्छी नस्ल का) काफी है।
- नर को हमेशा अलग बांधें और सिर्फ ब्रीडिंग के समय मादाओं के झुंड में छोड़ें।
7. गाभिन भेड़ की देखभाल: ‘स्टीमिंग अप’ (Pregnancy Care)
भेड़ का गर्भकाल लगभग 150 दिन (5 महीने) का होता है। आखिरी का 1 महीना सबसे महत्वपूर्ण है।
- स्टीमिंग अप (Steaming Up): ब्याने (Delivery) से 1 महीना पहले गाभिन भेड़ को चरने के अलावा रोज 200 ग्राम मक्का/गेहूं और 100 ग्राम खली अलग से दें।
- फायदा: इससे पेट में पल रहे बच्चे का वजन तेजी से बढ़ता है और पैदा होने के बाद माँ के थन में दूध (Udder development) भरपूर आता है।
- सावधानी: गाभिन भेड़ को बहुत दूर चराने न ले जाएं और कुत्तों से बचाकर रखें ताकि गर्भपात (Abortion) न हो।
8. नवजात मेमनों की देखभाल: ‘कोलोस्ट्रम’ का जादू (Lamb Care)
भेड़ पालन में मुनाफा तभी है जब बच्चे जिंदा रहें (Mortality Control)।
- पहला 1 घंटा: बच्चा पैदा होते ही उसकी नाक और मुंह से कफ साफ करें। उसे माँ का पहला गाढ़ा दूध (खीस/Colostrum) 1 घंटे के अंदर जरूर पिलाएं। यह उसका जीवन रक्षक टीका है।
- नाल (Navel): बच्चे की नाल को शरीर से 2 इंच छोड़कर काटें और उस पर तुरंत टिंचर आयोडीन (Tincture Iodine) लगाएं ताकि इन्फेक्शन न हो।
- ठंड से बचाव: मैडगयाल के बच्चे थोड़े नाजुक होते हैं। पहले 15 दिन उन्हें ठंडी हवा और गीली जमीन से बचाकर रखें।

9. ऊन कटाई: पैसा नहीं, सेहत के लिए (Shearing)
महाराष्ट्र और दक्षिण भारत की भेड़ों (जैसे मैडगयाल/दक्कनी) का ऊन बहुत कीमती नहीं होता, इससे कंबल (Ghongadi) बनते हैं। लेकिन बाल काटना जरुरी है।
- कब काटें: साल में 2 बार।
- मानसून से पहले (फरवरी-मार्च में)।
- सर्दी खत्म होने के बाद (सितंबर-अक्टूबर में)।
- फायदा: अगर बाल नहीं काटेंगे, तो बारिश में बाल गीले रहेंगे, उनमें कीड़े पड़ेंगे और भेड़ को निमोनिया हो जाएगा। बाल काटने से भेड़ का वजन भी बढ़ता है।
10. खुरों की कटाई (Hoof Trimming)
- समस्या: भेड़ें अगर नरम जमीन पर रहती हैं, तो उनके खुर (नाखून) बढ़ जाते हैं और मुड़ जाते हैं। इससे उन्हें चलने में दर्द होता है और ‘फुट रॉट’ (Foot Rot) बीमारी हो जाती है जिसमें खुर सड़ने लगते हैं।
- इलाज: साल में 2-3 बार कैंची (Hoof Trimmer) से बढ़े हुए खुरों को काटकर शेप में लाएं। यह काम बारिश शुरू होने से पहले जरुर करें।
11. ‘डिपिंग’ (Dipping): जुओं का सफाया
भेड़ के शरीर पर बहुत बाल होते हैं, इसलिए जुएं, चिचड़ी (Ticks) और पिस्सू वहां घर बना लेते हैं। स्प्रे करने से दवा अंदर तक नहीं जाती।
- डिपिंग टैंक: खेत में एक छोटा पानी का टैंक बनाएं। उसमें पानी और ‘साह्यपरमेथ्रिन’ (Cypermethrin) या ‘ब्यूटॉक्स’ (Butox) दवा घोलें।
- तरीका: भेड़ को (मुंह छोड़कर) पूरा इस पानी में 1 मिनट के लिए डुबोएं। इसे ‘डिपिंग’ कहते हैं। यह ऊन कटाई के 15 दिन बाद करें। इससे सारे परजीवी मर जाएंगे और भेड़ तंदुरुस्त रहेगी।

नोट: दवाओं का उपयोग पशु चिकित्सक की सलाह या दवा के लेबल निर्देशों के अनुसार ही करें। दवा का चयन और मात्रा भेड़ की उम्र, वजन और रोग की तीव्रता पर निर्भर करती है।
12. मार्केटिंग का सही तरीका: ‘नग’ नहीं, ‘वजन’ (Weight Basis Selling)
व्यापारी अक्सर किसान को बेवकूफ बनाते हैं। वे कहते हैं— “ये बच्चा छोटा है, इसका ₹5000 दूंगा।”
- तुलाई (Weighing): कभी भी अंदाज से (Per Piece) न बेचें। हमेशा कांटे पर तोलकर (Live Weight) बेचें।
- गणित: अगर बच्चे का वजन 25 किलो है और मांस का रेट ₹250/किलो (Live) चल रहा है, तो उसकी कीमत ₹6,250 होनी चाहिए। अगर आप बिना तोले देंगे, तो व्यापारी ₹4000 में ले जाएगा।
- ईद का मार्केट: कोशिश करें कि अपने नर बच्चों (Rams) को ईद-उल-जुहा (बकरीद) के लिए तैयार करें। उस समय भाव डबल मिलता है।
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नोट: ऊपर दिया गया नफा-नुकसान का हिसाब अनुमानित (Indicative) है। वास्तविक आमदनी भेड़ों की सेहत, प्रबंधन, बाजार भाव और क्षेत्र पर निर्भर करती है।
13. बीमा और रिस्क कवर (Insurance)
भेड़ पालन में रिस्क कम है, फिर भी ‘बड़ा नुकसान’ हो सकता है (जैसे बिजली गिरना, चोरी होना या महामारी)।
- प्रीमियम: सरकारी बीमा कंपनियों में भेड़ की कीमत का मात्र 3% से 4% प्रीमियम लगता है। (उदाहरण: ₹10,000 की भेड़ का प्रीमियम ₹400)।
- टैग: बीमा करवाने पर भेड़ के कान में ‘टैग’ (Tag) लगता है। अगर भेड़ मर जाए, तो डॉक्टर से पोस्टमार्टम कराकर पूरा क्लेम मिलता है। यह सुरक्षा कवच जरुर लें।
14. लोन और सरकारी सब्सिडी (Govt Schemes 2026)
सरकार ‘राष्ट्रीय पशुधन मिशन’ (NLM) के तहत भेड़ पालन को बढ़ावा दे रही है।
- योजना: “भेड़-बकरी पालन योजना” (50% सब्सिडी)।
- पात्रता: आप 20+1 या 50+2 भेड़ों के प्रोजेक्ट पर बैंक से लोन ले सकते हैं।
- महाराष्ट्र स्पेशल: महाराष्ट्र में ‘पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर मेंढी विकास महामंडल’ की कई योजनाएं (जैसे 75% सब्सिडी पर नर मेंढा) चलती हैं। अपने नजदीकी पशु चिकित्सालय में संपर्क करें।
15. रिकॉर्ड कीपिंग (Record Keeping)
सफल किसान वही है जिसके पास डायरी हो।
- क्या लिखें:
- ब्रीडिंग की तारीख (ताकि डिलीवरी डेट पता चले)।
- टीकाकरण (Vaccination) की तारीख।
- डिवॉर्मिंग (कीड़े की दवा) कब दी?
- किस भेड़ के बच्चे का वजन सबसे तेजी से बढ़ा? (ताकि अगली बार उसी के बच्चे रखें)।
16. लेंडी खाद का बिजनेस (Manure Processing)
सिर्फ भेड़ मत बेचिये, उसकी गंदगी भी बेचिये।
- प्रोसेस: भेड़ की लेंडी (Droppings) को इकट्ठा करें, सुखाएं और उसे पीसकर (Pulverize) पाउडर बना लें।
- पैकिंग: इसे 5 किलो और 10 किलो के बैग में पैक करें और शहर की नर्सरी या होम गार्डन वालों को बेचें।
- रेट: कच्ची खाद ₹2 किलो बिकती है, लेकिन पैकिंग वाली पाउडर खाद ₹20 किलो बिकती है। यह आपकी ‘पॉकेट मनी’ है जो चारे का खर्चा निकाल देगी।

17. नफा-नुकसान का पूरा गणित (Profit & Loss Statement – 50 Sheep Unit)
हम यहाँ एक कमर्शियल यूनिट (50 मादा + 2 नर) का हिसाब लगाएंगे। यह एक आदर्श यूनिट है जहाँ से एक परिवार का पूरा खर्चा निकल सकता है।
(नोट: यह हिसाब ‘मैडगयाल’ या अच्छी ‘दक्कनी’ क्रॉस ब्रीड पर आधारित है)
| विवरण (Particulars) | खर्च / आमदनी (₹) |
| A. फिक्स्ड लागत (One Time Investment) | |
| 50 मादा भेड़ (12-14 महीने की) x ₹12,000 | ₹6,00,000 |
| 2 ब्रीडर नर (High Quality) x ₹30,000 | ₹60,000 |
| शेड, बाड़ और उपकरण | ₹1,00,000 |
| कुल निवेश (Total Investment) | ₹7,60,000 (यह 5-7 साल चलेगा) |
| B. एक साल का खर्च (Running Cost) | |
| चारा (अगर अपनी जमीन है तो कम लगेगा) | ₹50,000 |
| दवा, टीकाकरण और बीमा (Insurance) | ₹15,000 |
| एक्स्ट्रा लेबर (अगर रखा है तो) | ₹60,000 |
| कुल रनिंग खर्च | ₹1,25,000 |
| C. कमाई (Income – 1 साल बाद) | |
| 1. मेमने (Lambs): 50 भेड़ों से लगभग 40-45 बच्चे बचते हैं। | |
| – 20 नर बच्चे (बेचे @ ₹15,000 ईद/मार्केट) | ₹3,00,000 |
| – 20 मादा बच्चे (स्टॉक बढ़ाया, वैल्यू ₹10,000/पीस) | ₹2,00,000 (Asset Value) |
| 2. लेंडी खाद (Manure): | |
| – 50 भेड़ x 1 टन खाद/साल = 50 टन @ ₹3000 | ₹1,50,000 |
| 3. ऊन (Wool): | ₹5,000 (नगण्य) |
| D. शुद्ध मुनाफा (Net Profit) | (कुल कमाई ₹6.5 लाख) – (रनिंग खर्च ₹1.25 लाख) = ₹5.25 लाख |
निष्कर्ष: पहले साल में आपकी पूंजी (Capital) वसूल नहीं होगी, लेकिन दूसरे साल से पूरा ₹5 लाख का सूखा मुनाफा आपकी जेब में होगा।
नोट: ऊपर दिया गया नफा-नुकसान का हिसाब अनुमानित (Indicative) है। वास्तविक आमदनी भेड़ों की सेहत, प्रबंधन, बाजार भाव और क्षेत्र पर निर्भर करती है।
18. इम्पोर्ट-एक्सपोर्ट: मटन का अंतर्राष्ट्रीय बाजार
भारत दुनिया के सबसे बड़े मटन निर्यातकों में से एक है। हमारी भेड़ों का मांस ‘लीन मीट’ (कम चर्बी वाला) होता है, जिसे अरब देशों में बहुत पसंद किया जाता है।
- कहाँ जाता है माल? सबसे ज्यादा डिमांड दुबई (UAE), सऊदी अरब, कतर, ओमान और कुवैत से है। वहां भारतीय मटन की कीमत बहुत ज्यादा है।
- किसान कैसे जुड़ें? एक छोटा किसान सीधे एक्सपोर्ट नहीं कर सकता। लेकिन आप APEDA (Agricultural and Processed Food Products Export Development Authority) के साथ रजिस्टर्ड ‘स्लॉटर हाउस’ (Slaughter Houses) या एग्रीगेटर को अपना माल बेच सकते हैं।
- शर्तें: एक्सपोर्ट क्वालिटी के लिए भेड़ का वजन 25 किलो+ होना चाहिए और उसे कोई बीमारी (जैसे FMD) नहीं होनी चाहिए। अगर आप ‘कॉन्ट्रैक्ट फार्मिंग’ करते हैं, तो एक्सपोर्टर आपको 10% ज्यादा रेट देता है।
असली ‘मैडगयाल’ भेड़ की पहचान कैसे करें? (Live Demo)
“किसान भाइयों, कई बार व्यापारी साधारण भेड़ को ‘मैडगयाल’ बताकर ठग लेते हैं।
असली मैडगयाल की ‘तोते जैसी नाक’ (Parrot Nose) और ‘लंबे कान’ कैसे दिखते हैं? और सांगोला मंडी में आज का भेड़ का भाव क्या चल रहा है?
👇 नीचे दिए गए वीडियो में मैंने लाइव दिखाया है। क्लिक करें और धोखा खाने से बचें! 👇
(नोट: इस वीडियो में मैंने एक सफल भेड़ पालक किसान का इंटरव्यू भी लिया है!)“
19. भारत की 4 सबसे बड़ी भेड़ मंडियां (Sheep Markets)
माल तैयार होने पर सही जगह बेचना बहुत जरुरी है। लोकल कसाई आपको कम रेट देगा। इन मंडियों के नाम नोट कर लें:
- सांगोला मंडी (सोलापुर, महाराष्ट्र): यह भेड़ों की ‘काशी’ है। यहाँ हर रविवार को करोड़ों का कारोबार होता है। पूरे भारत से व्यापारी यहाँ ‘मैडगयाल’ खरीदने आते हैं।
- देवनार मंडी (मुंबई): यह एशिया की सबसे बड़ी स्लॉटर मंडी है। यहाँ मांस के लिए (Cutting Purpose) जानवर बिकता है। यहाँ रेट वजन (kg) के हिसाब से मिलता है।
- चेंगीचेर्ला मंडी (हैदराबाद, तेलंगाना): दक्षिण भारत का सबसे बड़ा बाजार। यहाँ रामपुरी और नेल्लोर नस्ल की भारी डिमांड है।
- राजूवास / बीकानेर (राजस्थान): उत्तर भारत में ऊन और भेड़ का सबसे बड़ा केंद्र। अगर आप राजस्थान से हैं, तो यहाँ माल बेचें।

टिप: अपनी भेड़ों को ईद-उल-जुहा (बकरीद) से 1 महीना पहले इन मंडियों में ले जाएं, मुंहमांगा पैसा मिलेगा।
20. किसानों के ‘असली’ अनुभव (Success & Failure Stories)
1. अन्नासाहेब (सांगली, महाराष्ट्र) – “मैडगयाल का राजा”
“मैंने 10 साल पहले 5 साधारण भेड़ों से शुरुआत की थी। फिर मैंने एक ‘मैडगयाल’ नर खरीदा। आज मेरे पास 100 प्योर मैडगयाल भेड़ें हैं। मैं मटन के लिए नहीं बेचता, मैं ‘ब्रीडिंग’ (Breeding) के लिए बेचता हूँ। मेरा एक 6 महीने का नर बच्चा ₹50,000 में बिकता है। भेड़ पालन में अगर नस्ल (Breed) शुद्ध है, तो वो सोने से भी महंगी है।”
2. रामलाल धनगर (भीलवाड़ा, राजस्थान) – “खाद की कमाई”
“मेरे पास जमीन नहीं है, मैं सिर्फ भेड़ें चराता हूँ। लोग मुझे अपने खेत में भेड़ें बैठाने के पैसे देते हैं। पिछले साल अनार के एक किसान ने मुझे अपनी 200 भेड़ों को उसके खेत में 10 दिन रखने के लिए ₹30,000 नकद और 2 बोरी राशन दिया। भेड़ का मांस तो एक बार बिकता है, लेकिन उसकी लेंडी (खाद) रोज बिकती है।”
3. सुरेश रेड्डी (महबूबनगर, तेलंगाना) – “गलती से सीखा”
“मैंने शुरुआत में भेड़ों को ‘डिवॉर्मिंग’ (कीड़े की दवा) नहीं दी। बारिश में मेरी 20 भेड़ें ‘लीवर फ्लूक’ (Liver Fluke) बीमारी से मर गईं। मेरा 2 लाख का नुकसान हुआ। अब मैं कैलेंडर में तारीख लिखकर हर 3 महीने में दवा देता हूँ। अब एक भी भेड़ नहीं मरती। सीख: दवा का ₹100 बचाने के चक्कर में ₹10,000 की भेड़ मत मारो।”
22. भेड़ पालन से जुड़े 6 सबसे तीखे सवाल (FAQs)
ये वो सवाल हैं जो नए युवा किसान अक्सर पूछते हैं। इनके जवाब एकदम सटीक और अनुभव पर आधारित हैं।
Q1: क्या भेड़ पालन के लिए चराने की जगह (Grazing Land) होना जरुरी है? उत्तर: नहीं, बिल्कुल नहीं। आजकल ‘बंदिस्त पालन’ (Stall Feeding) का ट्रेंड है। आप भेड़ों को शेड में रखकर सूखा चारा (सोयाबीन/चना भूसा) और हरा चारा खिलाकर पाल सकते हैं। हालांकि, चराने से चारे का खर्चा 70% तक बच जाता है, इसलिए चराई (Grazing) मुनाफे के लिए बेहतर है।
Q2: भेड़ और बकरी में से ज्यादा मुनाफा किसमें है? उत्तर: यह आपकी परिस्थिति पर निर्भर करता है।
- अगर आपके पास जंगल/झाड़ियां हैं, तो बकरी पालें।
- अगर आपके पास खुला मैदान या खेत है, तो भेड़ पालें।
- भेड़ में बीमारी (Mortality) बकरी से कम आती है और इसे बेचना आसान है क्योंकि भेड़ का मटन (Lamb) और बकरी का मटन (Chevon) दोनों की भारी डिमांड है।
Q3: एक भेड़ साल में कितनी बार बच्चे देती है? उत्तर: भेड़ का गर्भकाल 5 महीने का होता है। आदर्श रूप से, भेड़ 2 साल में 3 बार बच्चे देती है (हर 8 महीने में एक बार)। अगर आप अच्छा मैनेजमेंट रखते हैं, तो आपका झुंड बहुत तेजी से बढ़ेगा।
Q4: मुझे ‘मैडगयाल’ की असली नस्ल कहाँ मिलेगी? उत्तर: दलालों से बचें। असली मैडगयाल के लिए आपको सांगली जिले (महाराष्ट्र) के जत, आटपाडी या सांगोला मंडी जाना चाहिए। वहां सीधे किसानों के घर से या मंडी से खरीदें। खरीदते समय भेड़ की ‘तोते जैसी नाक’ (Parrot Nose) जरुर चेक करें।
Q5: क्या भेड़ पालन के लिए बैंक लोन मिलता है? उत्तर: हाँ, केंद्र सरकार की ‘राष्ट्रीय पशुधन मिशन’ (NLM) के तहत भेड़ पालन पर 50% तक सब्सिडी उपलब्ध है। इसके अलावा महाराष्ट्र सरकार की ‘पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होल्कर’ योजना भी है। इसके लिए आपको अपने बैंक में एक ‘प्रोजेक्ट रिपोर्ट’ जमा करनी होगी।
Q6: भेड़ के बच्चे (Lambs) बेचने का सही समय क्या है? उत्तर: बच्चे को कभी भी 3 महीने से पहले न बेचें। सबसे अच्छा मुनाफा तब मिलता है जब बच्चा 6 से 8 महीने का हो जाए और उसका वजन 25-30 किलो हो। इस वजन पर कसाई और ब्रीडर दोनों मुंहमांगा पैसा देते हैं।
23. अंतिम निष्कर्ष: क्यों करें भेड़ पालन? (Final Conclusion)
मेरे किसान साथियों,
आखिर में, मैं (सचिन) और महायोद्धा टीम आपको यही सलाह देंगे— खेती में मानसून का भरोसा नहीं है, लेकिन भेड़ पालन (Sheep Farming) एक ऐसा बिजनेस है जो आपको कभी धोखा नहीं देगा। यह आपका ‘चलता-फिरता एटीएम’ (Walking ATM) है।
- जब पैसे की जरुरत हो, एक भेड़ बेचो और नकद ले लो।
- जब खाद की जरुरत हो, खेत में बिठाओ और यूरिया बचाओ।
खासकर अगर आप सूखे इलाके (Drought Area) से हैं, तो यह बिजनेस आपके लिए वरदान है। शुरुआत 10 भेड़ों से करें, धीरे-धीरे अनुभव लें और फिर इसे बढ़ाएं। डरिये मत, बस शुरुआत कीजिये!
“भेड़ है तो फिक्र नहीं, खेत में खाद और जेब में नोटों की कमी नहीं!”
महत्वपूर्ण अस्वीकरण (Important Disclaimer)
Mahayoddha.in यह लेख केवल सामान्य जानकारी और शैक्षिक उद्देश्य से लिखा गया है। इसमें दी गई जानकारी किसी भी प्रकार की पशु चिकित्सकीय, व्यावसायिक या वित्तीय सलाह का विकल्प नहीं है। पशु की उम्र, नस्ल, स्वास्थ्य स्थिति और स्थानीय परिस्थितियों के अनुसार उपचार, टीकाकरण एवं आहार में बदलाव हो सकता है। किसी भी दवा, टीकाकरण या निवेश से पहले अपने नजदीकी सरकारी पशु चिकित्सक या विशेषज्ञ से परामर्श अवश्य लें। Mahayoddha.in और लेखक इस जानकारी के उपयोग से होने वाले किसी भी नुकसान के लिए उत्तरदायी नहीं होंगे।
- जीवित प्राणी जोखिम (Mortality Risk): भेड़ एक जीवित प्राणी है। मौसम बदलने, महामारी (जैसे PPR/ET) या गलत खान-पान से भेड़ों की मौत हो सकती है। उचित टीकाकरण (Vaccination) न करवाने पर होने वाले किसी भी नुकसान के लिए किसान स्वयं जिम्मेदार होगा।
- बाजार भाव (Market Rate): लेख में बताए गए मुनाफे के आंकड़े (जैसे ₹5 लाख) एक आदर्श स्थिति (Ideal Condition) पर आधारित हैं। मंडी में भेड़ और मांस के भाव मांग और आपूर्ति के आधार पर कम या ज्यादा हो सकते हैं। हम किसी निश्चित लाभ की गारंटी नहीं देते।
- नस्ल की शुद्धता: मैडगयाल या किसी भी नस्ल को खरीदते समय अपनी परख का इस्तेमाल करें। किसी धोखेबाज व्यापारी से खराब नस्ल खरीदने पर वेबसाइट जिम्मेदार नहीं होगी।
- बीमा सलाह: हम सलाह देते हैं कि आप अपने पशुधन का बीमा (Insurance) अवश्य करवाएं ताकि किसी दुर्घटना की स्थिति में आपको क्लेम मिल सके।
नोट: यह वेबसाइट किसी भी जानवर की खरीद-फरोख्त (Trading) नहीं करती। हम सिर्फ जानकारी देते हैं।


