नमस्कार प्रगतिशील किसान भाइयों! क्या आप जानते हैं कि एक एकड़ तालाब में जितनी मछली पैदा होती है, उतनी मछली आप अपने घर के आंगन में रखे 4 टैंकों में पैदा कर सकते हैं?
जी हाँ, इस तकनीक का नाम है— बायोफ्लोक (Biofloc Technology – BFT)। यह तकनीक उन लोगों के लिए वरदान है जिनके पास बड़ी जमीन या तालाब नहीं है। लेकिन सावधान! बायोफ्लोक में “गलती की गुंजाइश” (Margin of Error) जीरो है। यदि लंबे समय तक बिजली बाधित होती है, तो मछलियों को नुकसान हो सकता है।
इसलिए, आज हम बायोफ्लोक की नींव (Foundation) यानी सेटअप और मशीनरी को बारीकी से समझेंगे।
1. जगह का चुनाव: टैंक कहाँ लगाएं? (Site Selection)
टैंक को कहीं भी ऊबड़-खाबड़ जमीन पर न रखें।
- समतल जमीन (Leveling): जमीन एकदम समतल होनी चाहिए। अगर जमीन टेढ़ी होगी, तो पानी का दबाव (Pressure) एक तरफ पड़ेगा और टैंक फट सकता है।
- बेस (Base): जमीन पर ईंटों का सोलिंग (Soling) करें या 2-3 इंच रेत (Sand) की परत बिछाएं। इससे तारपोलिन में कंकड़ नहीं चुभेंगे।
- शेड (Shade): बायोफ्लोक बैक्टीरिया को सीधी धूप नहीं चाहिए, लेकिन अंधेरा भी नहीं चाहिए। इसलिए टैंक के ऊपर 75% वाला ग्रीन नेट (Green Net) जरूर लगाएं। यह पानी का तापमान भी नियंत्रित रखता है।
2. टैंक का साइज: 10,000 लीटर या उससे बड़ा? (Tank Size Logic)
अगर आप नए हैं, तो सीधे बड़े टैंक पर छलांग न लगाएं।
- शुरुआत के लिए बेस्ट:10,000 लीटर (4 मीटर व्यास / Diameter)।
- कारण: इसका मैनेजमेंट आसान है। अगर कुछ गड़बड़ हुई तो नुकसान कम होगा। एक बार जब आप 1-2 कल्चर निकाल लें, तब बड़े टैंक लगाएं।
- कमर्शियल साइज: 50,000 लीटर या 1 लाख लीटर। इसमें मुनाफा ज्यादा है, लेकिन रिस्क भी ज्यादा है।
- ढांचा (Frame): टैंक गोल (Circular) ही होना चाहिए। चौकोर टैंक में कोने (Corners) होते हैं जहां गंदगी जमा होती है। गोल टैंक में पानी घूमता रहता है।
- मटेरियल: 5mm या 6mm की लोहे की जाली (Iron Mesh) का इस्तेमाल करें। जाली को जंग से बचाने के लिए पेंट जरूर करें।

3. तारपोलिन (The Skin): GSM का खेल (Tarpaulin Selection)
टैंक की जाली के अंदर जो प्लास्टिक की चादर लगती है, उसे तारपोलिन कहते हैं। यहाँ पैसे बचाने की कोशिश न करें।
- क्वालिटी: हमेशा ‘PVC Coated’ तारपोलिन ही लें। यह धूप और पानी में खराब नहीं होता।
- GSM क्या है?: GSM (Grams per Square Meter) का मतलब है मोटाई।
- 10,000 लीटर टैंक के लिए: 550 GSM से 650 GSM बेस्ट है।
- बड़े टैंक के लिए: 800 GSM तक जा सकते हैं।
- रंग: तारपोलिन का रंग अंदर से हल्का नीला (Light Blue) या सफेद होना चाहिए। इससे मछली को देखने में आसानी होती है। काला रंग न लें।
- प्रोटेक्शन शीट: लोहे की जाली और तारपोलिन के बीच में एक ‘प्रोटेक्टिव शीट’ (पुराने बैनर या फोम) जरूर लगाएं ताकि जाली की रगड़ से तारपोलिन न फटे।
4. सेंट्रल ड्रेनेज सिस्टम: टैंक की किडनी (Central Drainage)
बायोफ्लोक की जान उसका ‘ड्रेनेज’ है। मछलियां जो बीट (Potty) करती हैं और जो बचा हुआ दाना (Sludge) होता है, वो तली में बैठ जाता है। उसे बाहर निकालना जरुरी है।
- ढलान (Slope): टैंक बनाते समय मिट्टी का ढलान केंद्र (Center) की तरफ रखें। जैसे वॉश बेसिन में होता है।
- आउटलेट: टैंक के बिल्कुल बीच में एक होल (Outlet) रखें और वहां से पाइप निकालकर टैंक के बाहर ले जाएं। इससे आप रोज सुबह एक वॉल्व खोलकर गंदगी (Sludge) को बाहर निकाल सकते हैं। अगर यह नहीं किया, तो अमोनिया (Ammonia) बढ़ जाएगा और मछली मर जाएगी।
5. एरिएशन सिस्टम: मछली की ऑक्सीजन (Aeration – The Heart)
बायोफ्लोक में मछली को ऑक्सीजन पानी से नहीं, मशीन से मिलती है।
- एयर पंप (Air Pump):
- 10,000 लीटर टैंक के लिए: डायाफ्राम पंप (Diaphragm Pump) जैसे LP-100 या ACO-009 (100-120 लीटर प्रति मिनट हवा) काफी है।
- बड़े टैंक के लिए: रिंग ब्लोअर (Ring Blower) (0.5 HP या 1 HP) की जरुरत पड़ती है।
- एयर स्टोन (Air Stones): साधारण एक्वेरियम वाले पत्थर काम नहीं करेंगे। आपको ‘नैनो बबल ट्यूब’ (Nano Bubble Tube) या ‘गोल एयर स्टोन’ चाहिए जो बहुत बारीक बुलबुले बनाएं।
- मात्रा: 10,000 लीटर के टैंक में कम से कम 12 से 16 एयर स्टोन लगाएं।
- कनेक्शन: पंप से एक मुख्य पाइप (Main Line) लाएं और उससे छोटे पाइप (Lateral Pipe) जोड़कर पूरे टैंक में जाल बिछाएं।

6. पावर बैकअप: ‘मौत’ से बचने का रास्ता (Power Backup)
यह सबसे कड़वा सच है— बायोफ्लोक में मछली और बैक्टीरिया दोनों को 24 घंटे ऑक्सीजन चाहिए।
- खतरा: अगर लाइट गई और 1 घंटे तक हवा नहीं मिली, तो टैंक का ‘फ्लॉक’ (बैक्टीरिया) मरना शुरू हो जाएगा और नीचे बैठ जाएगा। 2-3 घंटे में मछलियां ऊपर आकर मरने लगेंगी।
- समाधान: आपके पास एक अच्छा इन्वर्टर (Inverter) या जनरेटर (Generator) होना अनिवार्य है। इसे ‘खर्चा’ नहीं, ‘इन्वेस्टमेंट’ समझें। सोलर इन्वर्टर एक अच्छा विकल्प है।
7. अन्य जरुरी औजार (Must-Have Tools)
इन छोटे औजारों के बिना बायोफ्लोक अधूरा है:
- Imhoff Cone (इम्हॉफ कोन): यह प्लास्टिक का कोन होता है जिससे हम नापते हैं कि पानी में फ्लॉक (Floc) कितना बना है।
- TDS मीटर: पानी का खारापन नापने के लिए।
- pH मीटर: पानी का pH (7.5 से 8.0) चेक करने के लिए।
- अमोनिया टेस्ट किट (Ammonia Kit): यह सबसे जरुरी है। यह बताता है कि पानी में जहर (अमोनिया) कितना है।
7. पानी भरना और शुद्धिकरण (Sanitization)
सबसे पहले टैंक को पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) से धो लें ताकि कोई पुराना इन्फेक्शन न रहे।
- पानी भरें: टैंक को 80% तक भरें (जैसे 10,000 लीटर टैंक में 8,000 लीटर पानी)।
- ब्लीचिंग पाउडर (TCCA): अगर आप नदी या बोरवेल का पानी ले रहे हैं जिसमें कीटाणु हो सकते हैं, तो उसमें ब्लीचिंग पाउडर (Calcium Hypochlorite) डालें। (मात्रा: 10,000 लीटर में 100-150 ग्राम)।
- अब हवा के पंप (Aeration) को चालू कर दें और 24 से 48 घंटे तक पानी को ऐसे ही छोड़ दें। इससे क्लोरीन गैस उड़ जाएगी। (बिना क्लोरीन उड़ाए प्रोबायोटिक कभी न डालें, वरना बैक्टीरिया मर जाएगा)।

8. नमक और चूने का खेल (TDS & pH Management)
अब हमें पानी को मछली और बैक्टीरिया के रहने लायक बनाना है।
- कच्चा नमक (Raw Salt):
- क्यों: नमक मछली का स्ट्रेस कम करता है और पानी में TDS (Total Dissolved Solids) बढ़ाता है। बायोफ्लोक के लिए 1500 से 1800 TDS सबसे बेस्ट है।
- कौन सा नमक: आयोडीन वाला टाटा नमक नहीं डालना है! बोरी वाला सस्ता ‘कच्चा नमक’ (Sea Salt) ही डालें। आयोडीन बैक्टीरिया को मार देता है।
- मात्रा: 10,000 लीटर पानी के लिए लगभग 8 से 10 किलो नमक। (TDS मीटर से चेक करते रहें)।
- कृषि चूना (Agricultural Lime – CaCO3):
- क्यों: यह पानी का pH और Alkalinity (क्षारीयता) बढ़ाता है। बायोफ्लोक में pH 7.5 से 8.0 के बीच होना चाहिए।
- सावधानी: पुताई वाला चूना (Quick Lime) न डालें, वह पानी गर्म कर देता है। हमेशा Dolomite या Calcium Carbonate पाउडर का प्रयोग करें।
- मात्रा: pH चेक करके डालें। अनुमानतः 10,000 लीटर में 500 ग्राम से 1 किलो चूना घोलकर डालें।
9. बैक्टीरिया का ‘दही’ जमाना (Probiotic Fermentation)
जैसे हम दूध से दही जमाने के लिए ‘जामन’ डालते हैं, वैसे ही पानी में फ्लॉक (Floc) बनाने के लिए हमें बैक्टीरिया का जामन तैयार करना पड़ता है।
- सामग्री:
- प्रोबायोटिक (Probiotics): बाजार में अच्छी कंपनी (Everfresh, Bio-Floc आदि) का प्रोबायोटिक पाउडर मिलता है जिसमें Bacillus Subtilis बैक्टीरिया होता है।
- गुड़ (Molasses): बैक्टीरिया का खाना। (काले रंग का सस्ता गुड़)।
- पानी: उसी टैंक का पानी।
- विधि (FCO – Fermented Carbon Organic):
- एक बाल्टी में 10 लीटर पानी लें।
- उसमें 200 ग्राम प्रोबायोटिक और 2 किलो गुड़ मिलाएं।
- बाल्टी में एक एयर स्टोन (हवा का पाइप) डाल दें और उसे ढंक दें।
- इसे 24 से 48 घंटे तक हवा चलने दें। इसे ‘फर्मेंटेशन’ कहते हैं।
- जब इसमें से खट्टी-मीठी (बियर जैसी) खुशबू आने लगे और झाग बन जाए, तो समझो आपका बैक्टीरिया ‘जाग’ गया है।
- टैंक में डालना: अब इस घोल को धीरे-धीरे अपने 10,000 लीटर वाले टैंक में डाल दें। (रात के समय डालना सबसे अच्छा होता है)।
नोट: दवाओं और रसायनों का उपयोग स्थानीय मत्स्य अधिकारी या उत्पाद लेबल के निर्देशानुसार ही करें।
10. C:N रेश्यो का गणित (C:N Ratio – The Master Key)
यह बायोफ्लोक का सबसे पेचीदा लेकिन जरुरी हिस्सा है।
- समस्या (Nitrogen): जब मछली दाना खाती है, तो वह अमोनिया (Nitrogen) छोड़ती है। यह अमोनिया मछली को मार सकता है।
- समाधान (Carbon): बैक्टीरिया अमोनिया (Nitrogen) को तभी खा पाएगा जब उसे साथ में ऊर्जा के लिए कार्बन (Carbon) मिलेगा। इसे ही C:N Ratio कहते हैं।
- सरल नियम (Thumb Rule):
- बैक्टीरिया को 1 हिस्सा नाइट्रोजन खाने के लिए 10 से 15 हिस्सा कार्बन चाहिए।
- महायोद्धा टिप: मछली को जितना दाना (Feed) दे रहे हैं, उसका 50% गुड़ (Molasses) टैंक में डालना पड़ता है।
- उदाहरण: अगर आपने मछली को 1 किलो दाना दिया, तो टैंक में 500 ग्राम गुड़ घोलकर डालना होगा। इससे अमोनिया कंट्रोल रहेगा और फ्लॉक (प्रोटीन) बनेगा।
11. 10 दिन का इंतजार (Floc Development)
बैक्टीरिया डालने के बाद, रोज टैंक में 50-100 ग्राम दाना (Feed) डालें ताकि बैक्टीरिया को अमोनिया मिले और वो अपनी संख्या बढ़ाए।
- रंग बदलना: 5-7 दिन बाद पानी का रंग हल्का भूरा (Brownish) या हरा-भूरा हो जाएगा। इसका मतलब फ्लॉक बन रहा है।
- इम्हॉफ कोन टेस्ट (Imhoff Cone Test):
- टैंक से 1 लीटर पानी कोन में भरें और 20 मिनट के लिए रख दें।
- अगर नीचे 5 ml से 10 ml गाढ़ा पदार्थ (Floc) जमा हो जाए, तो समझ लीजिये आपका पानी मछली डालने के लिए तैयार है।
- चेकिंग: इस दौरान अमोनिया (Ammonia) और नाइट्राइट (NO2) जीरो होना चाहिए।
12. मछली का चुनाव: ‘तिलापिया’ या ‘पंगास’? (Seed Selection)
सही बीज (Seed) चुनना ही आधी सफलता है।
- 1. गिफ्ट तिलापिया (GIFT Tilapia): बायोफ्लोक की रानी
- क्यों चुनें: यह बायोफ्लोक के लिए बेस्ट है। यह पानी में बने हुए ‘फ्लॉक’ (गंदगी/प्रोटीन) को बड़े चाव से खाती है, जिससे चारे का खर्च 30% कम हो जाता है।
- ग्रोथ: 5 से 6 महीने में 500-600 ग्राम की हो जाती है।
- डेंसिटी (10,000 लीटर में): आप 1000 से 1200 मछलियाँ डाल सकते हैं।
- 2. पंगास (Pangasius): तेजी से बढ़ने वाली
- क्यों चुनें: यह बहुत सख्त जान होती है और बहुत तेजी से बढ़ती है (6 महीने में 1 किलो)। नए किसानों के लिए यह सुरक्षित है।
- नुकसान: इसका मार्केट रेट (₹90-₹100) कम होता है और यह फ्लॉक कम खाती है।
- डेंसिटी: 10,000 लीटर में 800 से 1000 मछलियाँ।
- 3. सिंघी/देसी मांगुर (Singhi/Magur): काला सोना
- क्यों चुनें: यह ‘Air Breathing’ मछली है (हवा से सांस लेती है)। लाइट जाने पर भी नहीं मरती। इसका भाव ₹300 से ₹500 किलो है।
- सावधानी: थाई मांगुर (प्रतिबंधित) न पालें, सिर्फ देसी पालें।
- डेंसिटी: 10,000 लीटर में 2000 से 2500 मछलियाँ (क्योंकि ये तल में बैठती हैं)।

13. मछली छोड़ने का तरीका: ‘सैनिटाइजेशन’ (Sanitization)
बाजार से बीज (Seed) लाकर सीधे टैंक में पलटने की गलती न करें।
- तापमान मैच करना: बीज वाली पॉलीथिन को बिना खोले 15 मिनट तक टैंक के पानी में तैरने दें। ताकि थैली और टैंक के पानी का तापमान एक जैसा हो जाए।
- दवा का स्नान (Dip Treatment): एक टब में पानी और थोड़ा हल्दी + नमक या पोटैशियम परमैंगनेट (लाल दवा) का हल्का घोल बनाएं। मछलियों को 10 सेकंड के लिए इसमें डुबोएं और फिर टैंक में छोड़ें। इससे उनके शरीर का इन्फेक्शन टैंक में नहीं जाएगा।
14. फीडिंग मैनेजमेंट: मुनाफा यहीं छिपा है (Feeding Strategy)
बायोफ्लोक का असली जादू FCR (Feed Conversion Ratio) में है। साधारण तालाब में 1 किलो मछली बनाने के लिए 1.5 किलो दाना लगता है। बायोफ्लोक में 1.1 किलो दाना काफी है।
- कितना खिलाएं? मछली के शरीर के वजन (Body Weight) का 3% से 4% दाना रोज दें।
- उदाहरण: अगर टैंक में कुल 100 किलो मछली है, तो रोज 3-4 किलो दाना लगेगा। इसे 3 बार (सुबह, दोपहर, शाम) में बांटकर दें।
- फ्लॉक का फायदा:
- रोज सुबह Imhoff Cone में पानी चेक करें।
- अगर फ्लॉक 30 ml से ज्यादा है, तो बाजार का दाना 20% कम कर दें। मछली फ्लॉक खाकर पेट भरेगी। यही आपकी शुद्ध बचत है।
- साइज: जैसे-जैसे मछली बड़ी हो (1mm, 2mm, 4mm), दाने का साइज बढ़ाते रहें। फ्लोटिंग फीड (तैरने वाला दाना) ही सबसे अच्छा होता है।
15. पानी की टेस्टिंग: अमोनिया और NO2 (Water Testing)
मछली को ‘भूख’ से नहीं, ‘जहर’ (अमोनिया) से खतरा है। आपके पास ‘API Master Test Kit’ या अच्छी कंपनी की किट होनी चाहिए।
- अमोनिया (TAN):
- हर 3 दिन में चेक करें। रीडिंग 0.0 से 0.25 ppm होनी चाहिए (पीला/हरा रंग)।
- खतरा: अगर रीडिंग 1.0 ppm के ऊपर जाए तो मछली खाना छोड़ देगी।
- इलाज: तुरंत दाना बंद करें और टैंक में गुड़ (Molasses) घोलकर डालें (C:N Ratio वाला फॉर्मूला)। बैक्टीरिया अमोनिया को खा जाएगा।
- NO2 (Nitrite): यह भी जहरीला है। इसे कंट्रोल करने के लिए पानी का 10-20% हिस्सा बाहर निकालें और नया पानी डालें।
- pH: हमेशा 7.5 से 8.0 के बीच रखें। कम होने पर चूना (CaCO3) डालें।

16. हार्वेस्टिंग और प्रॉफिट-लॉस (Profit & Loss – P&L)
यह गणित 1 टैंक (10,000 लीटर) और 6 महीने की फसल (तिलापिया) का है।
| विवरण (Particulars) | खर्च (₹) |
| A. फिक्स्ड कॉस्ट (एक बार का खर्च) | |
| टैंक, तारपोलिन, एयर पंप, पाइपिंग | ₹25,000 |
| (यह खर्च 5 साल तक चलेगा) | |
| B. रनिंग कॉस्ट (हर फसल का खर्च) | |
| मछली का बीज (1200 पीस x ₹3) | ₹3,600 |
| फीड (दाना) – 600 किलो x ₹40 | ₹24,000 |
| बिजली बिल (6 महीने) | ₹3,000 |
| प्रोबायोटिक, गुड़ और नमक | ₹2,500 |
| कुल रनिंग लागत (Total Cost) | ₹33,100 |
| C. कमाई (Income) | |
| मृत्यु दर (Mortality) 10% हटाकर बची मछली | 1080 पीस |
| औसत वजन (500 ग्राम) | 540 किलो उत्पादन |
| बिक्री भाव (Rate) | ₹120 / किलो |
| कुल कमाई (Total Revenue) | ₹64,800 |
| D. शुद्ध मुनाफा (Net Profit) | ₹64,800 – ₹33,100 = ₹31,700 |
(नोट: यह मुनाफा सिर्फ 1 टैंक का है। अगर आपके आंगन में 4 टैंक हैं, तो 6 महीने में ₹1.25 लाख की कमाई घर बैठे हो सकती है।)
17. बायोफ्लोक के 3 स्वर्ण नियम (Golden Rules)
- बिजली: 24 घंटे बैकअप जरुरी है। जनरेटर या इन्वर्टर के बिना यह बिजनेस न करें।
- सफाई: टैंक के नीचे जमी गंदगी (Sludge) को हर 2-3 दिन में ड्रेनेज पाइप खोलकर थोड़ा सा निकाल दें।
- धैर्य: पहले कल्चर में ज्यादा मछली डालने का लालच न करें। पहले सीखें, फिर बढ़ाएं।
[बकरी पालन:] 10 बकरियों से शुरुआत और शेड का कम खर्चा—देखें पूरा प्रोजेक्ट रिपोर्ट।
18. बायोफ्लोक किसानों के ‘कड़वे-मीठे’ अनुभव (Real Farmer Stories)
ये कहानियां काल्पनिक नहीं हैं, यह अलग-अलग राज्यों के किसानों की असल स्थिति (Case Studies) पर आधारित हैं।
1. रमेश कुमार (वैशाली, बिहार) – “जिंदा मछली का जादू”
“सचिन भाई, मैंने अपने घर के पीछे 2 टैंक (10,000 लीटर) लगाए। मैंने उसमें ‘पंगास’ मछली डाली। मंडी में मरी हुई पंगास ₹90 किलो थी। मैंने अपने गेट पर बोर्ड लगा दिया— ‘यहाँ जिंदा मछली मिलती है’। लोग मेरे टैंक से अपनी पसंद की मछली निकलवाते हैं। मैं वही पंगास ₹140 किलो बेचता हूँ। ताजा और जिंदा होने के कारण मुझे ग्राहक खोजने नहीं पड़ते, ग्राहक मुझे खोजते हुए आते हैं।”
2. गुरप्रीत सिंह (करनाल, हरियाणा) – “सिंघी से लाखों कमाए”
“मैंने यूट्यूब देखकर बायोफ्लोक शुरू किया था। पहले मैंने रोहू डाली, वो मर गई। फिर मैंने समझा कि बायोफ्लोक में सिर्फ हाई वैल्यू मछली डालनी चाहिए। मैंने ‘देसी सिंघी’ (Singhi) का पालन किया। सिंघी को ऑक्सीजन की कम जरूरत होती है। 6 महीने बाद मैंने 10 टैंकों से 5 लाख रुपये का मुनाफा कमाया। बायोफ्लोक में सस्ती मछली पालना बेवकूफी है, महंगी मछली (सिंघी/मांगुर) ही पालें।”
3. अनिल पाटिल (नासिक, महाराष्ट्र) – “एक गलती और सब खत्म” (असफलता की कहानी)
“मेरी कहानी सबको बताना ताकि कोई और यह गलती न करे। मेरा कल्चर बहुत अच्छा चल रहा था। एक रात आंधी आई और ट्रांसफार्मर उड़ गया। मेरे पास जनरेटर नहीं था, मुझे लगा सुबह लाइट आ जाएगी। सुबह 4 बजे जब मैं गया, तो सारी मछलियाँ (1200 पीस) ऊपर तैर रही थीं—सब मर चुकी थीं। सीख: बायोफ्लोक में ‘बैकअप’ (Inverter) भगवान है। उसे कभी नजरअंदाज न करें।”
19. मार्केटिंग, इम्पोर्ट और एक्सपोर्ट: माल कहाँ बेचें?
बायोफ्लोक का माल बेचने के लिए आपको किसी बड़े व्यापारी के पास जाने की जरुरत नहीं है।
- लोकल मार्केटिंग (USP – Live Fish):
- तालाब की मछली मंडी तक पहुँचते-पहुँचते मर जाती है और बर्फ (Ice) में रखी जाती है।
- बायोफ्लोक की मछली ‘जिंदा’ (Live) बेची जा सकती है।
- रणनीति: अपने टैंक से 10-20 किलो मछली निकालें और एक छोटे प्लास्टिक टब में ऑक्सीजन पंप लगाकर बाजार में बैठें। जो मछली बर्फ में ₹100 की है, वही जिंदा होने पर ₹150 में बिकती है।
- होटल और ढाबा सप्लाई:
- बायोफ्लोक की मछली में मिटटी की गंध (Muddy Smell) नहीं आती क्योंकि यह साफ पानी में पलती है। इसका स्वाद बेहतर होता है।
- आसपास के नॉन-वेज होटलों से संपर्क करें और उन्हें ‘Premium Quality’ बताकर सप्लाई करें।
- एक्सपोर्ट (Export Potential):
- अगर आप बड़े स्तर पर (50-100 टैंक) ‘गिफ्ट तिलापिया’ या ‘झींगा’ (Shrimp/Prawn) करते हैं, तो एक्सपोर्ट संभव है।
- भारत से तिलापिया अमेरिका और खाड़ी देशों में जाती है। इसके लिए आपको MPEDA (Marine Products Export Development Authority) में रजिस्ट्रेशन कराना होगा। लेकिन छोटे किसान (1-5 टैंक) लोकल मार्केट पर ही फोकस करें।
किसान भाइयों, पढ़कर समझना मुश्किल है कि ‘फ्लॉक’ (बैक्टीरिया) कैसा दिखता है और इम्हॉफ कोन (Imhoff Cone) को कैसे पढ़ना है।
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20. बायोफ्लोक के 6 सबसे तीखे सवाल (FAQs)
ये वो सवाल हैं जो हर नए किसान के दिमाग में आते हैं। इन्हें आर्टिकल के अंत में जरूर डालें।
Q1: क्या बायोफ्लोक मछली पालन में बिजली का बिल बहुत ज्यादा आता है?
उत्तर: हाँ, यह सच है। एक 10,000 लीटर के टैंक के लिए एयर पंप (Air Pump) 24 घंटे चलता है। महीने का बिल लगभग ₹800 से ₹1000 (प्रति टैंक) आ सकता है। इसे अपनी लागत (Cost) में जोड़कर ही चलें।
Q2: क्या टैंक से बदबू (Smell) आती है? क्या इसे घर में रख सकते हैं?
उत्तर: अगर आप C:N रेश्यो (गुड़ डालना) सही रख रहे हैं और अमोनिया कंट्रोल में है, तो पानी से मिट्टी जैसी भीनी खुशबू आएगी, बदबू नहीं। लेकिन अगर अमोनिया बढ़ा, तो सड़े हुए अंडे जैसी बदबू आएगी। यानी बदबू आना ‘खतरे की घंटी’ है।
Q3: क्या हम बोरवेल (Borewell) का खारा पानी इस्तेमाल कर सकते हैं?
उत्तर: बिल्कुल! बायोफ्लोक के लिए खारा पानी (Salty Water) मीठे पानी से बेहतर है। मछली और बैक्टीरिया दोनों खारे पानी में खुश रहते हैं। बस TDS 1500-1800 के बीच रखें।
Q4: मैं शाकाहारी (Vegetarian) हूँ, क्या मैं यह कर सकता हूँ?
उत्तर: मछली को जो ‘फीड’ (दाना) दिया जाता है, वह सोयाबीन और मक्का से बना होता है (शाकाहारी)। लेकिन मछली पालन अंततः नॉन-वेज इंडस्री है। अगर आपको मछली पकड़ने या बेचने में परहेज नहीं है, तो आप कर सकते हैं।
Q5: क्या बायोफ्लोक के लिए कोई सरकारी लाइसेंस या सब्सिडी चाहिए?
उत्तर: अपने घर या निजी जमीन पर छोटे स्तर पर करने के लिए किसी लाइसेंस की जरुरत नहीं है। केंद्र सरकार की PMMSY (प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना) के तहत बायोफ्लोक यूनिट लगाने पर 40% से 60% सब्सिडी मिलती है। अपने जिले के ‘मत्स्य पालन अधिकारी’ (Fisheries Officer) से संपर्क करें।
Q6: क्या ठंड (Winter) में बायोफ्लोक कर सकते हैं?
उत्तर: उत्तर भारत (UP, Punjab, Haryana, Delhi) में दिसंबर-जनवरी में बहुत ठंड पड़ती है। अगर तापमान 15 डिग्री से नीचे गया, तो मछली खाना छोड़ देती है और बढ़वार (Growth) रुक जाती है। इसलिए ठंड में या तो पॉलीहाउस (Greenhouse) लगाएं या 2 महीने के लिए कल्चर बंद कर दें (Dry Period)।
निष्कर्ष: (Conclusion)
मेरे किसान साथियों,
अंत में, मैं (सचिन) आपसे बस इतना ही कहूँगा— बायोफ्लोक (Biofloc) कोई ‘जादू की छड़ी’ नहीं है कि आज टैंक लगाया और कल नोटों की बारिश होने लगी। यह शुद्ध विज्ञान (Pure Science) है।
- जो किसान पानी का pH और अमोनिया चेक करने में आलस करेगा, वह फेल हो जाएगा।
- लेकिन जो किसान इसे ‘इंजीनियर’ की तरह चलाएगा, वह अपने 10×10 के कमरे को भी ‘नोट छापने की मशीन’ बना सकता है।
भविष्य अब ‘बड़े तालाबों’ का नहीं, ‘स्मार्ट टैंकों’ का है। जमीन कम हो रही है, पानी कम हो रहा है, ऐसे में बायोफ्लोक ही वह तकनीक है जो भारत में ‘दूसरी नीली क्रांति’ (Second Blue Revolution) लाएगी।
शुरुआत एक टैंक से करें, सीखें, और फिर दुनिया को दिखा दें कि एक किसान सिर्फ खेत में नहीं, बल्कि टैंक में भी सोना उगा सकता है!
“पानी को समझो, मछली खुद ब खुद पल जाएगी!”
महत्वपूर्ण अस्वीकरण (Important Disclaimer)
Mahayoddha.in पर प्रकाशित यह लेख मत्स्य विज्ञान के सिद्धांतों, सफल बायोफ्लोक एक्सपर्ट्स के अनुभवों और सरकारी गाइडलाइन्स (NFDB) पर आधारित है। इसका उद्देश्य केवल सूचना और शिक्षा (Educational Purpose Only) है। बायोफ्लोक प्रोजेक्ट शुरू करने से पहले पाठक निम्नलिखित जोखिमों को गंभीरता से नोट करें:
- तकनीकी जोखिम (Technical Risk): बायोफ्लोक तकनीक पूरी तरह से बिजली और एरिएशन (Oxygen) पर निर्भर है। अगर पावर बैकअप (Inverter/Generator) फेल होता है, तो आधे घंटे के भीतर पूरी फसल नष्ट हो सकती है। ऐसी किसी भी यांत्रिक विफलता (Mechanical Failure) के लिए वेबसाइट जिम्मेदार नहीं होगी।
- वित्तीय अनुमान (Financial Risk): लेख में बताए गए मुनाफे के आंकड़े (Profit Calculation) एक आदर्श स्थिति (Ideal Condition) पर आधारित हैं। मछली की मृत्यु दर (Mortality), दाने की कीमत और मंडी का भाव आपके मुनाफे को कम या ज्यादा कर सकता है। हम किसी निश्चित लाभ की गारंटी नहीं देते।
- जल गुणवत्ता (Water Quality): हर क्षेत्र के पानी का गुणधर्म (Source Water TDS/pH) अलग होता है। बिना लैब टेस्ट कराए और बिना छोटी टेस्टिंग के सीधे बड़े स्तर पर कल्चर शुरू न करें। अमोनिया (Ammonia) बढ़ने से होने वाले नुकसान के लिए किसान स्वयं जिम्मेदार होगा।
- दवाओं का प्रयोग: लेख में प्रोबायोटिक्स (Probiotics) और रसायनों (TCCA/Bleaching Powder) का जिक्र है। इनका उपयोग एक्सपर्ट की देखरेख में और सही मात्रा में ही करें।
सलाह: हम अनुशंसा करते हैं कि कोई भी बड़ा निवेश करने से पहले आप अपने नजदीकी ‘कृषि विज्ञान केंद्र’ (KVK) या ‘जिला मत्स्य अधिकारी’ से प्रशिक्षण (Training) अवश्य लें।


