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डेयरी व्यवसाय में हम अक्सर एक बड़ी गलती करते हैं—हम दूध देने वाले पशु की सेवा तो जी-जान से करते हैं, लेकिन नवजात बछिया को ‘वेस्ट’ (व्यर्थ) समझकर छोड़ देते हैं। याद रखिए, आज की बछिया ही कल की गाय है। अगर आप बाहर से 1 लाख रुपये की गाय खरीदने के बजाय अपने ही फार्म पर एक अच्छी बछिया तैयार करते हैं, तो आपका मुनाफा दोगुना हो जाता है।
आज के इस विशेष लेख में हम जानेंगे कि जन्म से लेकर 1 साल तक बछड़ों का पालन कैसे करें, ताकि वे समय पर ‘गाभण’ (Pregnant) हों और रिकॉर्ड दूध दें।
1. जन्म के तुरंत बाद के 24 घंटे: सबसे नाजुक समय
बछड़े के जन्म के पहले कुछ घंटे उसकी पूरी जिंदगी की सेहत तय करते हैं।
- सांस लेना: जन्म के बाद अगर बछड़ा सांस न ले रहा हो, तो उसकी नाक के नथुनों में पुआल डालकर गुदगुदी करें।
- नाभि (Navel) की सफाई: नाभि को जड़ से 2 इंच छोड़कर साफ धागे से बांधें और नए ब्लेड से काटकर उस पर ‘टिंचर आयोडीन’ लगाएं। इससे ‘नेवल इल’ जैसी बीमारी नहीं होगी।
- खीस (Colostrum) का महत्व: जन्म के 1 घंटे के भीतर बछड़े को उसकी माँ का पहला दूध (खीस) जरूर पिलाएं। खीस में इम्युनोग्लोबुलिन होते हैं जो बछड़े को बीमारियों से लड़ने की ताकत देते हैं।
सचिन भाई की टिप: “खीस पिलाने में कभी देरी न करें। बछड़े के वजन का 10% हिस्सा (लगभग 2-3 लीटर) खीस उसे पहले 24 घंटे में मिलनी ही चाहिए।”

2. आहार प्रबंधन: खीस से ‘काफ स्टार्टर’ तक का सफर
बछड़े का पेट (Rumen) जन्म के समय विकसित नहीं होता। उसे धीरे-धीरे ठोस आहार पर लाना जरूरी है।
- 0-3 महीने: मुख्य आहार दूध ही रहेगा। लेकिन 15 दिन के बाद उसे थोड़ा-थोड़ा ‘काफ स्टार्टर’ और कोमल हरा चारा दिखाना शुरू करें।
- काफ स्टार्टर (Calf Starter): यह एक उच्च प्रोटीन वाला दाना मिश्रण है। इसमें 22-24% प्रोटीन होना चाहिए।
- मक्का: 40%
- खली (Groundnut/Soybean Cake): 30%
- चोकर: 25%
- मिनरल मिक्सचर और नमक: 5%

3. वैज्ञानिक टीकाकरण चार्ट (Vaccination Schedule 2026)
बीमारियां आने के बाद इलाज महंगा पड़ता है, इसलिए ‘बचाव’ ही सबसे अच्छा रास्ता है। 2026 के नए नियमों के अनुसार यहाँ एक चार्ट दिया गया है:
| उम्र | टीका (Vaccine) | बीमारी |
| 4-6 महीने | Brucellosis (केवल बछिया को) | संक्रामक गर्भपात |
| 6 महीने | FMD (Foot & Mouth) | खुरपका-मुँहपका |
| 7 महीने | HS (Hemorrhagic Septicemia) | घटसर्प |
| 8 महीने | BQ (Black Quarter) | लंगड़ा बुखार |
महत्वपूर्ण: हर 6 महीने में FMD, HS और BQ का बूस्टर डोज जरूर लगवाएं।
4. डीवर्मिंग (Deworming): पेट के कीड़ों का सफाया
बछड़ों की मौत का सबसे बड़ा कारण पेट के कीड़े होते हैं।
- पहला डोज: जन्म के 10वें दिन (एल्बेंडाजोल या पाइपरजीन लिक्विड)।
- अगला डोज: हर महीने 6 महीने की उम्र तक। इसके बाद हर 3 महीने में एक बार।
- पहचान: अगर बछड़े की आंखों से कीचड़ आ रहा है, पेट फूल रहा है या वह मिट्टी खा रहा है, तो समझ लीजिए उसे कीड़े हैं।
5. आवास प्रबंधन (Housing)
बछड़ों को कभी भी बड़ी गायों के साथ न बांधें।
- अलग बाड़ा: बछड़ों के लिए सूखा और हवादार बाड़ा होना चाहिए।
- बिछावन: जमीन पर पुआल या सूखी घास बिछाएं, खासकर सर्दियों और बरसात में।
- धूप: सुबह की 1-2 घंटे की धूप बछड़ों की हड्डियों (विटामिन-D) के लिए बहुत जरूरी है।

6. बछिया को समय पर ‘तैयार’ कैसे करें?
एक आदर्श बछिया को 15-18 महीने की उम्र में पहली बार ‘हिट’ पर आ जाना चाहिए।
- वजन का लक्ष्य: कृत्रिम गर्भाधान (AI) के समय बछिया का वजन कम से कम 250-280 किलो होना चाहिए।
- मिनरल मिक्सचर: 6 महीने की उम्र के बाद बछिया को रोज 30-50 ग्राम अच्छी क्वालिटी का मिनरल मिक्सचर दें। यह उसके गर्भाशय के विकास के लिए अनिवार्य है।
सचिन भाई की सलाह: “अगर आपकी बछिया 2 साल तक गाभण नहीं हो रही है, तो समझ लीजिए आपके प्रबंधन में कमी है। सही पोषण ही समय पर फल देता है।”
7. ‘सेक्स सॉर्टेड सीमेन’ का भविष्य
2026 में तकनीक बहुत आगे निकल गई है। अब आप अपनी बछिया को ‘सेक्स सॉर्टेड सीमेन’ (Sex Sorted Semen) से गाभण करवाएं। इससे 90% चांस है कि वह आगे चलकर बछिया ही देगी। इससे आपके फार्म पर फालतू बछड़ों की संख्या कम होगी और आपका डेयरी बिजनेस मुनाफे में रहेगा।

8. डी-हॉर्निंग (सींग रोधन)
बछड़ों के सींग 15 दिन से 1 महीने की उम्र के बीच ही निकलवा देने चाहिए।
- तरीका: इलेक्ट्रिक डी-हॉर्नर या कास्टिक सोडा स्टिक का इस्तेमाल करें।
- फायदा: सींग न होने से पशु आपस में लड़कर घायल नहीं होते और उन्हें संभालना आसान होता है।
9. डेयरी फार्मिंग में रिकॉर्ड कीपिंग
हर बछड़े का एक रिकॉर्ड कार्ड बनाएं। इसमें उसका जन्म दिनांक, वजन, माँ-पिता का रिकॉर्ड और टीकाकरण की तारीख लिखें। यह रिकॉर्ड आपको यह पहचानने में मदद करेगा कि कौन सी बछिया भविष्य में सबसे ज्यादा दूध देगी।
10. ‘बछड़ा घर’ (Calf Pen) की स्वच्छता और अमोनिया गैस का खतरा
अक्सर हम बछड़ों को गायों के पीछे वाले हिस्से में बांध देते हैं जहाँ गोबर और पेशाब की वजह से अमोनिया गैस बनती है।
- गहरी जानकारी: अमोनिया गैस बछड़ों के फेफड़ों को बहुत जल्दी खराब करती है, जिससे उन्हें निमोनिया हो जाता है।
- समाधान: बछड़ों का फर्श हमेशा सूखा होना चाहिए। अगर मुमकिन हो तो लकड़ी के तख्तों या रबर मैट का इस्तेमाल करें। चूने का छिड़काव फर्श पर करने से कीटाणु मर जाते हैं और अमोनिया की गंध भी खत्म हो जाती है।

11. ‘काफ स्कौर’ (Calf Scour) यानी सफेद दस्त का प्रबंधन
जन्म के पहले 15 दिनों में बछड़ों की मौत का सबसे बड़ा कारण ‘सफेद दस्त’ होता है।
- सावधानी: यह अक्सर गंदे बर्तनों में दूध पिलाने या ज्यादा दूध पिलाने से होता है।
- इलाज: अगर बछड़े को दस्त हो जाएं, तो तुरंत दूध बंद न करें, लेकिन उसे ORS (इलेक्ट्रोलाइट) का घोल जरूर दें। पानी की कमी (Dehydration) ही बछड़े की जान लेती है, दस्त नहीं। सचिन भाई की सलाह है कि दस्त होते ही पशु चिकित्सक से संपर्क करें और ‘सल्फा’ ग्रुप की दवाइयों के बारे में पूछें।
12. वजन मापने का वैज्ञानिक तरीका (Weight Monitoring)
बिना वजन मापे आप यह नहीं जान सकते कि आपकी बछिया सही से बढ़ रही है या नहीं।
- लक्ष्य: एक अच्छी नस्ल की बछिया का वजन हर महीने कम से कम 15 से 20 किलो बढ़ना चाहिए।
- जुगाड़: अगर आपके पास वजन का कांटा नहीं है, तो ‘गर्थ टेप’ (पशु के सीने की गोलाई नापने वाला फीता) का इस्तेमाल करें। 6 महीने में बछिया का वजन कम से कम 100-120 किलो होना ही चाहिए।
13. ‘साइलेज’ (मक्के का अचार) कब शुरू करें?
कई किसान छोटे बछड़ों को कच्चा हरा चारा या ज्यादा सूखा भूसा देने लगते हैं।
- नियम: 3 महीने से छोटे बछड़ों को साइलेज न दें, क्योंकि उनका पेट (Rumen) इसे पचाने के लिए तैयार नहीं होता। 3 महीने के बाद धीरे-धीरे साइलेज शुरू करें। इससे उनकी बढ़त (Growth) बहुत तेज़ होती है और जर्सी या एचएफ (HF) जैसी नस्लों में यह बहुत अच्छे परिणाम देता है।

14. मानसिक स्वास्थ्य: ‘ग्रुप हाउसिंग’ का महत्व
वैज्ञानिक शोध बताते हैं कि जो बछड़े अकेले बांधे जाते हैं, उनके मुकाबले जो बछड़े झुंड (3-4 बछड़ों के साथ) में रहते हैं, वे ज्यादा तेज़ बढ़ते हैं और जल्दी खाना सीखते हैं।
- नसीहत: 2 महीने की उम्र के बाद बछड़ों को छोटे ग्रुप में रखें। इससे उनमें ‘प्रतिस्पर्धा’ (Competition) पैदा होती है और वे एक-दूसरे को देखकर चारा और दाना जल्दी खाना शुरू कर देते हैं। इसे ‘सोशल लर्निंग’ कहते हैं, जो भविष्य में उन्हें एक शांत और स्वस्थ गाय बनाने में मदद करती है।
15. सचिन भाई की खास सलाह: जो कोई डॉक्टर नहीं बताएगा!
मेरे किसान भाइयों, बछड़ा पालन केवल तकनीक नहीं, एक भावना है। यहाँ मेरे कुछ निजी अनुभव हैं जो मैंने हिंगोली और नांदेड़ के डेयरियों में देखे हैं:
- दूध पिलाने का ‘अंगूठा नियम’: बछड़े को कभी भी बाल्टी में मुँह डालकर दूध न पिलाएं। उसे हमेशा उसकी माँ के थन से या निप्पल वाली बोतल से दूध पिलाएं। जब बछड़ा गर्दन उठाकर दूध पीता है, तो दूध सीधे उसके चौथे पेट (Abomasum) में जाता है। झुककर पीने से दूध गलत पेट में जाकर सड़ सकता है।
- ठंड से बचाना ही सबसे बड़ी सेवा है: नवजात बछड़े के शरीर में चर्बी बहुत कम होती है। सर्दियों में उसे ‘झूल’ (कपड़े का कवर) जरूर पहनाएं और जमीन पर गद्दा या पुआल बिछाएं। अगर बछड़े को ठंड लग गई, तो उसकी ग्रोथ 1 महीना पीछे चली जाती है।
- पानी की उपलब्धता: हम सोचते हैं कि बछड़ा दूध पी रहा है तो उसे पानी की क्या जरूरत? यह गलत है। 15 दिन के बाद बछड़े के सामने हमेशा साफ और ताजा पानी रखें। पानी पीने से उसका ‘काफ स्टार्टर’ जल्दी पचता है और पेट का विकास तेज होता है।
- प्यार और स्पर्श (Touch Therapy): बछड़े के शरीर पर रोज 5 मिनट हाथ फेरें या खरहरा (Brushing) करें। इससे पशु इंसान का दोस्त बनता है और बड़ा होने पर दूध निकालते समय लात नहीं मारता। जो पशु शांत होता है, वह 10% ज्यादा दूध देता है।
- नसीब की बछिया: “भाइयों, अगर आपके घर में ‘लक्ष्मी’ (बछिया) पैदा हुई है, तो उसे बेचने की गलती कभी न करें। आज की 5,000 की बछिया को 2 साल पाल लो, वह 1 लाख की गाय बनेगी। बाहर से गाय खरीदकर लाना जुआ है, लेकिन खुद की बछिया तैयार करना गारंटी वाला मुनाफा है।”

16. हमारे क्षेत्र के सफल पशुपालकों के अनुभव (परभणी, नांदेड़, अकोला और वाशिम)
मैंने खुद इन जिलों के प्रगतिशील किसानों से बात की है, जिन्होंने बछिया पालन को एक लाभदायक व्यवसाय बनाया है। उनके ये अनुभव आपको बहुत कुछ सिखाएंगे:
1. परभणी के गजाननराव का ‘काफ स्टार्टर’ फॉर्मूला:
“परभणी में गर्मी बहुत होती है, इसलिए मैं बछड़ों को 15 दिन के बाद से ही खुद का बनाया ‘काफ स्टार्टर’ देने लगता हूँ। मैंने देखा है कि जो बछिया दाना जल्दी खाना शुरू करती है, उसका शरीर तेज़ी से बढ़ता है। मेरी बछिया ने मात्र 16 महीने में पहली बार गाभण (AI) होकर सबको चौंका दिया था।”
2. नांदेड़ के विठ्ठलराव का ‘सेक्स सॉर्टेड सीमेन’ पर भरोसा:
“नांदेड़ जिले के हमारे छोटे गांवों में पहले लोग बछड़ों को बोझ समझते थे। लेकिन अब हम ‘सेक्स सॉर्टेड सीमेन’ इस्तेमाल कर रहे हैं। मेरे फार्म पर पिछले साल 5 बछिया पैदा हुईं। आज एक भी बछड़ा नहीं है, जिससे मेरा चारे का खर्चा बचा और भविष्य के लिए 5 नई गाय तैयार हो रही हैं।”
3. अकोला के शेख भाई की ‘ठंड और स्वच्छता’ की टिप:
“अकोला की काली मिट्टी में बरसात के समय बहुत कीचड़ होता है। मैंने अपने बछड़ों के लिए जमीन से 2 फीट ऊपर लकड़ी के तख्तों का फर्श बनाया है। इससे उन्हें निमोनिया और सफेद दस्त नहीं होते। स्वच्छता ही बछड़ों की आधी दवाई है।”
4. वाशिम के संतोष जी का ‘टीकाकरण’ का अनुभव:
“वाशिम में पिछले साल घटसर्प (HS) का प्रकोप बढ़ा था। जिन भाइयों ने टीकाकरण (Vaccination) में लापरवाही की, उनके बछड़े नहीं बच पाए। मैंने समय पर टीका लगवाया था, इसलिए मेरा एक भी बछड़ा बीमार नहीं पड़ा। वैक्सीन पर 10 रुपये खर्च करना, बाद में हजारों की दवा से बेहतर है।”
17. बछड़ों के स्वास्थ्य की ‘इमरजेंसी’ पहचान (Deep Health Analysis)
अक्सर बछड़ा बीमार होने के बाद हमें पता चलता है, लेकिन अगर आप इन संकेतों को पहले पहचान लें, तो उसकी जान बचाई जा सकती है:
- आंखों की चमक: अगर बछड़े की आंखें अंदर धंस रही हैं, तो समझ लीजिए उसे ‘डिहाइड्रेशन’ (पानी की कमी) हो गई है। तुरंत ओआरएस (ORS) शुरू करें।
- कानों का तापमान: यदि बछड़े के कान ठंडे पड़ रहे हैं, तो यह ‘कैल्शियम’ की कमी या बुखार आने का संकेत है।
- चमड़ी की लचीलापन: बछड़े की गर्दन की खाल खींचकर छोड़ें, अगर वह तुरंत वापस अपनी जगह नहीं जाती, तो उसे गंभीर दस्त की शिकायत हो सकती है।
- नाक का गीलापन: एक स्वस्थ बछड़े की नाक हमेशा हल्की गीली (Muzzle moisture) होनी चाहिए। अगर नाक सूखी है, तो उसे बुखार हो सकता है।
18. बछड़ों के लिए ‘आधुनिक गैजेट्स’ और तकनीक (Smart Farming 2026)
2026 की डेयरी फार्मिंग अब केवल लाठी और बाल्टी की नहीं रह गई है। आप इन आधुनिक चीजों का जिक्र करके अपने लेख की वैल्यू बढ़ा सकते हैं:
- ऑटोमैटिक मिल्क फीडर: बड़े फार्मों पर अब ऐसी मशीनें हैं जो बछड़े के कान के टैग को स्कैन करके उसे उसकी जरूरत के हिसाब से दूध पिलाती हैं।
- काफ जैकेट (Calf Jackets): छोटे बछड़ों को ठंड से बचाने के लिए विशेष जैकेट, जो उनके शरीर का तापमान स्थिर रखते हैं।
- डिजिटल वेट स्केल: वजन नापने का छोटा डिजिटल कांटा, जिससे हर हफ्ते बढ़त ट्रैक की जा सके।
- पशु आधार (INAPH): हर बछड़े का ‘ई-गोपाला’ ऐप पर रजिस्ट्रेशन करवाएं ताकि उसका पूरा टीकाकरण और वंशावली (Pedigree) का रिकॉर्ड सरकार के पास और आपके मोबाइल पर रहे।
यह भी पढ़ें: भाइयों, पशुपालन के साथ-साथ अगर आप कम पानी में ज्यादा मुनाफा देने वाली बागवानी करना चाहते हैं, तो हमारा यह विशेष लेख जरूर पढ़ें: 👉 सीताफल की खेती: बंजर जमीन से लाखों की कमाई का सीक्रेट
19. बछिया पालन का ‘5 साल का बिजनेस प्लान’ (Financial Planning)
यहाँ हम किसानों को बताएंगे कि यह कैसे एक करोड़पति बनाने वाला बिजनेस है:
- साल 1: निवेश और बछिया की तैयारी (खर्चा: ₹15,000 – ₹20,000)।
- साल 2: बछिया गाभण होती है। इसकी कीमत अब ₹40,000 से ₹50,000 हो चुकी है।
- साल 3: पहली बार बच्चा देती है। अब यह एक ‘गाय’ है जिसकी कीमत ₹80,000 से ₹1,00,000 है।
- फायदा: अगर आपने 10 बछिया तैयार कीं, तो 3 साल में आपकी संपत्ति की वैल्यू 10 लाख रुपये हो जाएगी। बिना बाहर से कोई गाय खरीदे!

20. बछड़ों में होने वाली ‘विदेशी’ बीमारियां और सावधानी
आजकल लम्पी (Lumpy) और खुरपका-मुँहपका (FMD) के नए वेरिएंट्स आ रहे हैं।
- सावधानी: बाहर से आए किसी भी नए पशु को अपने बछड़ों के बाड़े से कम से कम 21 दिन दूर रखें (Quarantine)।
- कीट नियंत्रण: मक्खी और मच्छर बछड़ों को सबसे ज्यादा परेशान करते हैं। बाड़े में नीम के तेल का दीपक जलाएं या ‘फ्लाई ट्रैप’ लगाएं।
क्या आप बछड़ों के पालन और पशुपालन की तकनीक को वीडियो के माध्यम से और भी बारीकी से समझना चाहते हैं?
21. परभणी और अकोला के कृषि विश्वविद्यालयों की सिफारिशें
हमारे परभणी कृषि विश्वविद्यालय (VNMKV) और अकोला (PDKV) के वैज्ञानिकों के अनुसार:
- बछड़ों को शुरुआती चारे के रूप में ‘यशवंत’ या ‘जयवंत’ जैसी घास की कुट्टी (Chaffing) करके देना चाहिए।
- गर्मी के दिनों में बछड़ों के पानी में ‘इलेक्ट्रोलाइट’ के साथ-साथ थोड़ा गुड़ और नमक जरूर मिलाएं।

निष्कर्ष (Conclusion)
मेरे किसान योद्धाओं! चाहे आप हिंगोली में हों या अकोला, वाशिम, परभणी या नांदेड़ में, पशुपालन का विज्ञान सबके लिए एक ही है। बछड़ों का पालन करना कोई मुश्किल काम नहीं है, बस इसके लिए सही समय पर सही निर्णय (जैसे- खीस पिलाना, कीड़ों की दवा और टीका) लेना जरूरी है।
आज की यह बछिया ही आपके घर की आर्थिक स्थिति बदलेगी। इसे बोझ न समझें, इसे अपने फार्म की ‘भविष्य की संपत्ति’ समझें। अगर आप इन वैज्ञानिक तरीकों और हमारे सफल किसानों के अनुभवों को अपनाते हैं, तो निश्चित ही आप डेयरी व्यवसाय में एक नया मुकाम हासिल करेंगे।
जय जवान, जय किसान, जय महायोध्दा!
महत्वपूर्ण अस्वीकरण (Detailed Disclaimer)
Mahayoddha.in पर उपलब्ध यह लेख केवल सामान्य जागरूकता, शैक्षिक जानकारी और पशुपालकों के मार्गदर्शन के उद्देश्य से लिखा गया है। हम (लेखक एवं प्रकाशक) यह सुनिश्चित करने का पूरा प्रयास करते हैं कि जानकारी सटीक और 2026 के नवीनतम मानकों के अनुरूप हो, फिर भी पाठक कृपया निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान दें:
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- टीकाकरण और दवाइयां: टीकाकरण (Vaccination) और डीवर्मिंग (Deworming) के लिए बताए गए चार्ट एक सामान्य मानक हैं। किसी भी पशु को टीका लगाने या कोई भी दवा (एंटीबायोटिक या देसी नुस्खा) देने से पहले अपने नजदीकी सरकारी पशु अस्पताल या लाइसेंस प्राप्त डॉक्टर से लिखित परामर्श जरूर लें। गलत दवा या गलत खुराक पशु के लिए जानलेवा साबित हो सकती है।
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