मुर्राह भैंस पालन 2026: रोज़ 20 लीटर दूध, सही पहचान, खुराक और सरकारी सब्सिडी की पूरी जानकारी

नमस्कार किसान और पशुपालक योद्धाओं! Mahayoddha.in पर आपका फिर से स्वागत है।

आज हम बात करेंगे डेयरी फार्मिंग के असली ‘ब्लैक गोल्ड’ यानी काला सोना के बारे में। जी हाँ, मैं बात कर रहा हूँ मुर्राह भैंस (Murrah Buffalo) की। अगर आप खेती के साथ-साथ एक ऐसा बिजनेस शुरू करना चाहते हैं जो आपको हर सुबह और शाम नकदी (Cash) कमाकर दे, तो मुर्राह भैंस पालना सबसे समझदारी भरा फैसला है।

लेकिन भाइयों, भैंस खरीदना आसान है, पर उसे ‘प्रॉफिट’ में चलाना एक कला है। बहुत से किसान बिना जानकारी के भैंस ले आते हैं और फिर दूध कम होने या समय पर गाभिन न होने के कारण घाटा उठाते हैं। आज आपका भाई सचिन आपको मुर्राह भैंस पालन की वो ए-टू-जेड (A-Z) जानकारी देगा, जो आपको एक सफल डेयरी उद्यमी बनाएगी।


Table of Contents

1. मुर्राह भैंस ही क्यों? (The Why Factor)

पूरे भारत में, खासकर हमारे महाराष्ट्र में, मुर्राह को सबसे ज्यादा पसंद किया जाता है। इसकी तीन बड़ी वजहें हैं:

  • जबरदस्त दूध: एक अच्छी मुर्राह भैंस एक लेक्टेशन (ब्यात) में 2500 से 3000 लीटर तक दूध दे सकती है।
  • हाई फैट (High Fat): इसके दूध में 7% से 9% तक फैट होता है, जिससे डेयरी पर आपको गाय के मुकाबले दोगुना रेट मिलता है।
  • मजबूत शरीर: यह भैंस महाराष्ट्र की गर्मी (40-45°C) को आसानी से झेल लेती है और बीमार कम पड़ती है।

2. असली मुर्राह की पहचान कैसे करें? (Identification)

बाजार में हर काली भैंस मुर्राह नहीं होती। धोखा खाने से बचने के लिए ये 4 बातें याद रखें:

  1. सींग (Horns): मुर्राह के सींग छोटे और ‘जलेबी’ की तरह अंदर की ओर गोल मुड़े हुए होते हैं।
  2. रंग: इसका रंग बिल्कुल कोयले जैसा ‘जेट ब्लैक’ (Jet Black) होता है। शरीर पर कहीं और सफेद धब्बे (पूंछ के सिरे को छोड़कर) नहीं होने चाहिए।
  3. सिर और गर्दन: इसका सिर छोटा और गर्दन लंबी व साफ होती है।
  4. अडर (Udder): दूध निकालने वाली थैली (अडर) चौड़ी होती है और चारों थन समान दूरी पर होते हैं।
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3. भैंस का दूध बढ़ाने का ‘महायोद्धा’ डाइट चार्ट (Feeding)

भैंस के पेट में जो जाएगा, वही दूध बनकर बाहर आएगा। सिर्फ सूखा चारा खिलाना सबसे बड़ी गलती है।

  • हरा चारा: साल भर हरा चारा दें (जैसे सुपर नेपियर, मक्का या अजोला)।
  • दाना मिश्रण (Concentrate): चूरी, खल और बिनौला का मिश्रण दें। नियम याद रखें— हर 2 लीटर दूध पर 1 किलो दाना और शरीर के रख-रखाव के लिए अलग से 1-2 किलो दाना।
  • मिनरल मिक्सचर: हर दिन 50 ग्राम अच्छी कंपनी का मिनरल मिक्सचर जरूर दें। इससे भैंस समय पर ‘हीट’ में आती है और दूध की क्वालिटी बढ़ती है।

4. डेयरी शेड का सही प्रबंधन (Housing)

भैंस को पानी और ठंडक बहुत पसंद है।

  • शेड की ऊंचाई: छत कम से कम 10-12 फीट ऊँची रखें ताकि हवा का संचार बना रहे।
  • फॉगर्स और पंखे: गर्मियों में भैंस का तापमान कम रखने के लिए पंखे या पानी की फुहार (Foggers) लगाएं। अगर भैंस तनाव में रहेगी, तो दूध 20% तक गिर जाएगा।
  • साफ-सफाई: गोबर को दिन में 3 बार साफ करें। गीली जगह पर थनैला (Mastitis) रोग होने का डर रहता है।
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5. बीमारियों से सुरक्षा और टीकाकरण (Health)

एक बीमार भैंस पूरे सीजन का मुनाफा खा जाती है।

  • टीकाकरण (Vaccination): खुरपका-मुँहपका (FMD), गलघोंटू और ब्रुसेलोसिस के टीके सरकारी अस्पताल से समय पर लगवाएं।
  • पेट के कीड़े (Deworming): हर 3 महीने में कीड़ों की दवाई बदल-बदल कर दें।
  • थनैला से बचाव: दूध निकालने के बाद थनों को लाल दवा (Potassium Permanganate) के घोल से साफ करें।

6. भैंस पालन के लिए सरकारी सब्सिडी और लोन (Subsidy 2026)

महाराष्ट्र सरकार और नाबार्ड (NABARD) डेयरी को बहुत बढ़ावा दे रहे हैं।

  • पशु संवर्धन योजना: महाराष्ट्र में 2, 4 या 6 दुधारू पशुओं के वितरण की योजना आती है, जिसमें 50% से 75% तक सब्सिडी मिलती है।
  • लोन: आप ‘पशु किसान क्रेडिट कार्ड’ (KCC) के जरिए कम ब्याज पर बैंक से लोन ले सकते हैं।

7. मुनाफे का टेबल: 5 मुर्राह भैंस का गणित (1 साल का)

विवरण (Description)अनुमानित लागत/आय (₹)
5 भैंसों की खरीद (₹1 लाख/भैंस)₹5,00,000
चारा और दाना खर्च (सालाना)₹2,50,000
कुल दूध उत्पादन (औसत 50 लीटर/दिन)15,000 लीटर (300 दिन)
दूध की कमाई (₹70/लीटर भाव)₹10,50,000
शुद्ध मुनाफा (खर्च काटकर)₹6,00,000 – ₹7,00,000

नोट: दूध उत्पादन, बिक्री मूल्य और मुनाफा पशु की क्षमता, देखभाल, स्थानीय बाजार भाव और मौसम पर निर्भर करता है। यह आंकड़े केवल अनुमान और शैक्षिक उद्देश्य के लिए हैं।

8. ड्राई पीरियड (Dry Period) का महत्व: अगली ब्यात की तैयारी

बहुत से किसान भैंस से तब तक दूध निकालते हैं जब तक वह बच्चा न दे दे। यह गलत है।

  • महायोद्धा टिप: भैंस को बच्चा देने से कम से कम 60 दिन पहले दूध निकालना बंद कर देना चाहिए (इसे ‘ड्राई’ करना कहते हैं)। इस समय भैंस के शरीर को आराम मिलता है, जिससे अगले ब्यात में वह 20% ज्यादा दूध देती है और उसका बच्चा भी तंदुरुस्त पैदा होता है।

9. भैंसों में ‘गर्मी’ (Heat) की पहचान का सीक्रेट

भैंस अक्सर रात के समय गर्मी (Heat) में आती है, जिसे ‘साइलेंट हीट’ कहते हैं।

  • पहचान: अगर भैंस बार-बार पेशाब करे, कम खाए, और पारदर्शी डिस्चार्ज (ताते) दे, तो समझो वह पाल खिलाने के लिए तैयार है। गर्मी में आने के 12 से 18 घंटे के बाद ही एआई (AI) या सांड से क्रॉस करवाना सबसे सही समय है।

10. बछड़े/बछड़ी (Calf) का पालन: भविष्य की तैयारी

आज की बछड़ी ही कल की दुधारू भैंस बनेगी।

  • कोलोस्ट्रम (Colostrum): पैदा होने के 1 घंटे के अंदर बच्चे को ‘खीस’ (माँ का पहला गाढ़ा दूध) जरूर पिलाएं। यह बच्चे के लिए जीवन रक्षक दवा है।
  • डीहॉर्निंग (Dehorning): अगर आप सींग रहित भैंस चाहते हैं, तो 15 दिन की उम्र में ही सींग की कलियों को दबवा दें।
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11. थनैला रोग (Mastitis) से बचाव का ‘स्ट्रिप कप’ टेस्ट

थनैला डेयरी का सबसे बड़ा दुश्मन है। इसे पहचानने के लिए दूध निकालने से पहले पहली दो धार एक काले कप (Strip Cup) में निकालें। अगर दूध में थक्के या खून दिखे, तो तुरंत डॉक्टर को बुलाएं। दूध निकालने के बाद थनों को ‘डिप’ (Teat Dip) करना न भूलें।

12. गर्मियों में भैंस को नहलाने का सही तरीका

भैंस को पसीना नहीं आता, इसलिए उसे गर्मी बहुत लगती है।

  • शिड्यूल: दिन में कम से कम 2 से 3 बार भैंस को नहलाएं। दोपहर 12 से 3 बजे के बीच जब धूप तेज हो, तब भैंस के शरीर पर पानी डालने से उसका दूध उत्पादन स्थिर रहता है।

13. साइलेज (Silage) – चारे का अचार

जब गर्मियों में हरा चारा खत्म हो जाता है, तब दूध गिर जाता है।

  • समाधान: मक्का या ज्वार का ‘साइलेज’ बनाकर रखें। इसे गड्डा खोदकर चारे को दबाकर बनाया जाता है। यह चारे की कमी को दूर करता है और दूध में फैट कम नहीं होने देता।

14. मिनरल मिक्सचर और नमक का रोल

भैंस के शरीर के लिए कैल्शियम, फास्फोरस और मैग्नीशियम बहुत जरूरी हैं।

  • खुराक: हर भैंस के पास एक ‘नमक का ढेला’ (Mineral Lick) लटका दें। वह उसे चाटती रहेगी, जिससे उसकी पाचन शक्ति बढ़ेगी और वह समय पर गाभिन होगी।

15. गोबर गैस प्लांट (Biogas) से दोहरा मुनाफा

डेयरी के साथ गोबर गैस प्लांट लगाना एक स्मार्ट बिजनेस है। इससे आपके घर की रसोई का खर्चा (LPG) बच जाएगा और जो स्लरी (बचा हुआ गोबर) निकलेगी, वह आपकी मिर्च और पपीते की खेती के लिए सबसे बेहतरीन खाद होगी।

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16. रिकॉर्ड कीपिंग (Record Keeping) – हिसाब किताब

एक महायोद्धा किसान वही है जिसे पता हो कि कौन सी भैंस कितना खा रही है और कितना दूध दे रही है।

  • क्या लिखें: भैंस के बच्चा देने की तारीख, एआई (AI) की तारीख, टीकाकरण और दूध का हर दिन का रिकॉर्ड। इससे आपको पता चलेगा कि कौन सी भैंस फायदे में है और कौन सी घाटे में।

17. पशु बीमा (Animal Insurance)

पशु की अचानक मृत्यु पूरे बिजनेस को हिला सकती है।

  • सलाह: हमेशा अपनी महंगी मुर्राह भैंस का बीमा करवाएं। सरकारी योजनाओं के तहत बहुत कम प्रीमियम में पशु का बीमा हो जाता है, जिससे आपका निवेश सुरक्षित रहता है।

18. दूध से कमाई के तरीके : सिर्फ दूध ही क्यों?

सचिन भाई की टिप— “भाइयों, सीधा दूध बेचने के बजाय अगर आप उसका उत्पाद बनाकर बेचेंगे, तो मुनाफा दोगुना हो जाएगा।”

  • पनीर और खोया: मुर्राह के दूध में फैट ज्यादा होता है, इसलिए इससे पनीर और खोया बहुत बेहतरीन बनता है। शादियों के सीजन में इसकी भारी डिमांड रहती है।
  • घी (A2 Buffalo Ghee): भैंस का शुद्ध घी ₹600 से ₹800 किलो तक बिकता है। इसे आप कांच की बोतल में पैक करके ऑनलाइन भी बेच सकते हैं।
  • दही और छाछ: गर्मियों में अपनी ब्रांडिंग के साथ ठंडी छाछ बेचना एक बहुत बड़ा बिजनेस है।

19. मुर्राह भैंस का निर्यात (Export): भारत का गौरव

मुर्राह भैंस की मांग पूरी दुनिया में है। भारत से यह भैंस वियतनाम, फिलीपींस, ब्राजील और खाड़ी देशों में निर्यात (Export) की जाती है।

  • सीमेन एक्सपोर्ट (Semen Export): टॉप क्वालिटी के मुर्राह सांडों का सीमेन विदेशों में बहुत ऊँचे दामों पर बेचा जाता है।
  • लाइव स्टॉक एक्सपोर्ट: अगर आप एक ‘ब्रीडिंग फार्म’ खोलते हैं और अच्छी नस्ल की भैंसें तैयार करते हैं, तो आप उन्हें दूसरे राज्यों और देशों के व्यापारियों को बेचकर मोटा मुनाफा कमा सकते हैं।

20. नुकसान से कैसे बचें? (Risk Management)

डेयरी फार्मिंग में घाटा तभी होता है जब मैनेजमेंट खराब हो।

  • रिप्लेसमेंट कॉस्ट: अपनी पुरानी भैंस को बेचने से पहले अपनी खुद की तैयार की हुई बछड़ी (Heifer) तैयार रखें ताकि दूध का उत्पादन कभी न रुके।
  • बिचौलियों से बचें: कोशिश करें कि दूध सीधे ग्राहकों या अपनी खुद की डेयरी को दें। बिचौलिए (दूधिया) अक्सर कम रेट देते हैं।

“भैंसों को बीमारियों से बचाने के लिए उनके शेड के आसपास साफ-सफाई रखें। क्या आप जानते हैं कि [तरबूज की खेती] के वेस्ट (छिलके) भैंसों के लिए गर्मियों में पानी की कमी दूर करने का अच्छा स्रोत हैं? साथ ही, गोबर की खाद का उपयोग [मिर्च की खेती] में करने से मिर्च का आकार और तीखापन बढ़ता है। पूरी जानकारी के लिए हमारे अन्य लेख जरूर पढ़ें।”

21. साइलेंट हीट (Silent Heat) का पक्का इलाज

भैंसों में ‘साइलेंट हीट’ सबसे बड़ी सिरदर्दी है—यानी भैंस गर्मी में तो आती है लेकिन बोलती नहीं, जिससे किसान को पता नहीं चलता और समय निकल जाता है।

  • पहचान की ट्रिक: हर सुबह सूरज निकलने से पहले और रात को सोने से पहले अपनी भैंसों को गौर से देखें। अगर भैंस का व्यवहार बदला हुआ है या वह दूसरी भैंसों पर चढ़ने की कोशिश कर रही है, तो समझो वह हीट में है। इसके लिए खेत में एक ‘टीजर बुल’ (नसबंदी किया हुआ सांड) रखना भी एक एडवांस तरीका है।
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22. दूध निकालने का सही तरीका: ‘फुल हैंड मिल्किंग’ (Full Hand Milking)

बहुत से किसान उंगली और अंगूठे के बीच थन को दबाकर दूध निकालते हैं (knuckling)। इससे थन के अंदर की नसें दब जाती हैं और धीरे-धीरे थन खराब हो जाता है।

  • महायोद्धा टिप: हमेशा ‘पूर्ण हस्त दोहन’ (पूरे हाथ से मुट्ठी बंद करके) तकनीक का इस्तेमाल करें। दूध निकालते समय शांत रहें और 7-8 मिनट के अंदर दूध पूरा निकाल लें, क्योंकि उसके बाद भैंस ‘दूध चढ़ा’ (Milk let down) देती है।

23. वेस्ट मैनेजमेंट: गोबर से ‘गोल्ड’ तक का सफर

एक भैंस दिन में लगभग 15-20 किलो गोबर देती है। इसे सिर्फ कूड़ा न समझें।

  • अतिरिक्त आय: गोबर से ‘वर्मीकम्पोस्ट’ (Vermicompost) यानी केंचुआ खाद तैयार करें। 1 किलो केंचुआ खाद ₹10-15 में बिकती है।
  • खेती में उपयोग: अगर आप अपनी [मिर्च] या [तरबूज] की खेती में इस खाद का उपयोग करते हैं, तो आपकी जमीन की उपजाऊ शक्ति 3 गुना बढ़ जाएगी और रासायनिक खाद (यूरिया/डीएपी) का खर्चा 50% कम हो जाएगा।
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24. प्रगतिशील किसानों के ‘ज़मीनी अनुभव’ (Real Farmer Success Stories)

जब हम दूसरों की सफलता देखते हैं, तभी हमारा आत्मविश्वास बढ़ता है। यहाँ हमारे क्षेत्र के दो सफल पशुपालकों के अनुभव हैं जिन्होंने ‘महायोद्धा’ तकनीक को अपनाया:

अ) हिंगोली के गजानन पाटिल का अनुभव:

“भाइयों, मैं पहले देसी भैंस पालता था जो मुश्किल से 5-6 लीटर दूध देती थी। फिर मैंने सचिन भाई की सलाह पर हरियाणा से एक शुद्ध मुर्राह भैंस मंगवाई। शुरुआत में मुझे ₹1.2 लाख महँगे लगे, लेकिन आज वह भैंस हर दिन 18 लीटर दूध दे रही है। मेरा सबसे बड़ा सीक्रेट यह है कि मैं उसे दिन में 3 बार नहलाता हूँ और कभी भी प्यासा नहीं रहने देता। आज उसी एक भैंस के दम पर मैंने दो और बछड़ियाँ तैयार कर ली हैं।”

ब) परभणी के शेख कलीम का ‘फैट’ बढ़ाने वाला नुस्खा:

“डेयरी पर मेरा दूध हमेशा ₹50-55 के रेट पर जाता था क्योंकि फैट कम आता था। मैंने दाने में बिनौला खल (Cottonseed Cake) और मिनरल मिक्सचर शुरू किया और शाम के समय पानी थोड़ा कम कर दिया। मात्र 15 दिन में मेरा फैट 6.5 से बढ़कर 8.2 हो गया। अब मेरा वही दूध ₹75 लीटर बिक रहा है। पशुपालन में ‘खुराक’ ही सब कुछ है।”

दूध और फैट बढ़ाने का ‘सीक्रेट’ फॉर्मूला “अगर आप जानना चाहते हैं कि मैं अपनी भैंसों को कौन सा दाना देता हूँ और घर पर ‘मिनरल मिक्सचर’ कैसे तैयार करता हूँ, तो यह वीडियो आपके लिए है। लाइव रिजल्ट देखने के लिए अभी प्ले बटन दबाएं और MahaYoddha परिवार का हिस्सा बनें!”


25. मुर्राह भैंस पालन पर अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQ)

प्रश्न 1: एक मुर्राह भैंस की औसत कीमत क्या होती है? उत्तर: दूध देने की क्षमता और नस्ल की शुद्धता के आधार पर एक अच्छी मुर्राह भैंस ₹80,000 से लेकर ₹1.5 लाख तक मिलती है।

प्रश्न 2: क्या मुर्राह भैंस को खुले में चराया जा सकता है? उत्तर: हाँ, लेकिन इसे ‘स्टॉल फीडिंग’ (खूंटे पर बांधकर खिलाना) ज्यादा पसंद है। इसे ज्यादा धूप में घुमाने से इसका दूध कम हो सकता है।

प्रश्न 3: भैंस का दूध बढ़ाने के लिए कौन सा दाना सबसे अच्छा है? उत्तर: बिनौला खल (Cottonseed Cake), मक्का का दलिया और गेहूं का चोकर सबसे अच्छा मिश्रण माना जाता है।

प्रश्न 4: भैंस के बच्चे (कटड़ा/कटड़ी) को पालना क्यों जरूरी है? उत्तर: कटड़ी को पालना इसलिए जरूरी है क्योंकि 3 साल बाद वह एक नई भैंस बनकर तैयार होगी, जिससे आपको नई भैंस खरीदने का ₹1 लाख का खर्चा बच जाएगा।

प्रश्न 5: भैंस को दिन में कितनी बार पानी पिलाना चाहिए? उत्तर: गर्मियों में कम से कम 4-5 बार और सर्दियों में 2-3 बार ताज़ा और साफ पानी पिलाना चाहिए।

26. निष्कर्ष:

किसान योद्धाओं! आज के इस विस्तृत सफर के बाद एक बात बिल्कुल साफ है— मुर्राह भैंस पालन केवल एक पशुपालन का व्यवसाय नहीं है, बल्कि यह ग्रामीण भारत की अर्थव्यवस्था की रीढ़ है। जहाँ खेती में हम मौसम और बाजार के भरोसे रहते हैं, वहीं एक ‘मुर्राह’ आपके खूंटे पर बंधी वह बैंक एफडी (FD) है जो आपको हर सुबह और शाम नकदी (Cash) कमाकर देती है।

इस पूरे लेख का निचोड़ इन 3 बातों में है:

  1. नस्ल ही असल है: अगर शुरुआत में ₹10,000 ज्यादा देकर आपने ‘शुद्ध नस्ल’ की भैंस ली है, तो वह आपको लाखों का दूध देगी।
  2. मैनेजमेंट ही मुनाफा है: दूध भैंस के थन से नहीं, बल्कि आपके ‘मैनेजमेंट’ (सही दाना, साफ पानी और समय पर टीकाकरण) से निकलता है।
  3. धैर्य की जीत: डेयरी फार्मिंग रातों-रात अमीर बनने की योजना नहीं है। यह प्रेम, सेवा और धैर्य का काम है।

उठो महायोद्धाओं! पारंपरिक खेती के साथ इस ‘काले सोने’ को अपने घर लाइए। जब आपकी अगली पीढ़ी अपनी पढ़ाई और तरक्की आपके डेयरी बिजनेस के दम पर करेगी, तब आपकी असली जीत होगी। याद रखिये— “पशु की सच्ची सेवा ही, ईश्वर की सबसे बड़ी सेवा है।”


महत्वपूर्ण अस्वीकरण (Detailed Disclaimer)

Mahayoddha.in पर उपलब्ध यह जानकारी किसानों की जागरूकता, व्यक्तिगत अनुभवों और पशुपालन विशेषज्ञों के साथ किए गए परामर्श के आधार पर केवल शैक्षिक उद्देश्यों (Educational Purposes) के लिए साझा की गई है। पशुपालन एक अत्यंत संवेदनशील और जोखिम भरा व्यवसाय हो सकता है, इसलिए पाठक कृपया निम्नलिखित बिंदुओं पर ध्यान दें:

  • चिकित्सीय परामर्श अनिवार्य: इस लेख में सुझाए गए दाना मिश्रण (Feed), टीकाकरण (Vaccination) और बीमारियां केवल सामान्य मार्गदर्शन के लिए हैं। किसी भी पशु को दवा देने या उपचार शुरू करने से पहले अपने नजदीकी पंजीकृत सरकारी पशु चिकित्सक (Registered Veterinary Officer) से परामर्श अवश्य लें।
  • वित्तीय जोखिम: डेयरी फार्मिंग में बाजार के दूध के रेट, चारे की कीमतों में उतार-चढ़ाव और पशुओं की आकस्मिक मृत्यु या बीमारी का जोखिम हमेशा बना रहता है। Mahayoddha.in या लेखक सचिन किसी भी प्रकार की प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष वित्तीय हानि (Financial Loss) के लिए कानूनी रूप से जिम्मेदार नहीं होंगे।
  • परिणामों में भिन्नता: दूध उत्पादन के आंकड़े पशु की उम्र, आनुवंशिकी (Genetics), स्थानीय जलवायु और आपके द्वारा दी जाने वाली देखभाल पर निर्भर करते हैं। आपके परिणाम लेख में दिए गए औसत आंकड़ों से भिन्न हो सकते हैं।
  • सरकारी योजनाएं: लेख में बताई गई सब्सिडी और लोन की योजनाएं सरकार द्वारा समय-समय पर बदली जा सकती हैं। आवेदन करने से पहले संबंधित विभाग (पशुपालन विभाग या बैंक) से ताजा जानकारी प्राप्त करें।

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